Saturday, March 22, 2014

कुम्भ के मेले में मंगलवासी -समीक्षाएँ

देवेन्द्र मेवाड़ी
नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से डा. अरविंद मिश्र की विज्ञान कथाओं का सद्यः प्रकाशित संकलन ‘कुंभ के मेले में मंगलवासी’ पढ़ने का सुखद मौका मिला। सुखद इसलिए कि एक अरसे बाद एक अनुभवी और संवेदनशील विज्ञान कथाकार की भारतीय विज्ञान कथाएं पढ़ने को मिलीं। कभी मैं उनकी विज्ञान कथाओं का प्रथम पाठक हुआ करता था। वर्षों पहले अपने लंबे पत्र-संवादों में हम हिदी में विज्ञान कथाओं की कमी और इस कथा विधा के स्वरूप पर गंभीर चर्चा किया करते थे। तब एक बार मैंने ‘भारतीय विज्ञान कथा’ की बात की थी तो डा. अरविंद ने पूछा था, ‘भारतीय विज्ञान कथा से आपका क्या तात्पर्य है? विज्ञान कथा तो वैश्विक होती है।’ मैंने कहा था, ‘ऐसी विज्ञान कथा जिसमें भारतीय समाज की संवेदनाएं हों।’ आज ‘कुंभ के मेले में मंगलवासी’ संकलन की भारतीय विज्ञान कथाएं पढ़कर मन प्रसन्न हो गया।

दो दशक पूर्व हम दोनों के रचनात्मक निर्माण के दिन थे। हिंदी विज्ञान कथा के संबंध में एक बार डा. अरविंद मिश्र ने अपने पत्र-संवाद में मुझे लिखा था, “क्या विज्ञान कथाओं में भड़कीले यंत्रों की क्रिया-विधि, उनकी वनावट और कल-पुर्जों की लंबी-चौड़ी दास्तान अहमियत रखती है? बिना इसके वैज्ञानिक कहानी क्या सच्ची विज्ञान कथा नहीं बन सकती? मैं सोचता हूं, आपका जवाब होगा, नहीं, वैज्ञानिक कहानी के लिए यंत्र-तंत्र का ताम-झाम कोई जरूरी नहीं। जी हां, सही फरमाते हैं आप। अगर हम विज्ञान कथा को इस रूप में देखें तो वह हमारे भविष्य के ‘बदले’ हुए समाज के सोच, संस्कृति, रहन-सहन, संस्कारों को किस हद तक रूपायित करती है, तभी शायद हम एक सच्ची विज्ञान कथा का सृजन कर सकते हैं। और, इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों, यंत्रों की विशद जानकारी के बजाए इस ट्रेंड पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जिनसे इन तकनीकी उपलब्धियों के चलते समाज में बदलाव की प्रक्रिया को बल मिलता है। उसके रहन-सहन में कहां तक बदलाव आता है, समाज और व्यक्ति विशेष के नजरिए में क्या फर्क आता है? उसकी अपनी अभिव्यक्ति कहां तक प्रभावित होती है? उसके रिश्ते-नातों पर क्या असर पड़ता है? उसकी मूलभूत भावनाएं कहां तक छूती-अछूती रह पाती हैं? उसके संस्कारों की बेड़ियां क्या और कसती जाती है या टूटनी आरंभ होती हैं, और वह बिल्कुल स्वतंत्र हो जाता है? खुद अपने से भी स्वतंत्र? अपनी देह से भी मुक्ति क्या संभव हो सकेगी? पर, शर्ते यह है कि ज़िदा होने की अनुभूति बनी रहनी चाहिए। क्या हम इन सभी आयामों को विज्ञान कथा के कैनवस में समेट नहीं सकते? शायद भारतीय संदर्भ में एक सच्ची विज्ञान कथा वही होगी जो इस पृष्ठभूमि के साथ न्याय करती हो। (अरविंद मिश्र, 15 जनवरी 1992, बंबई)

खुशी है कि डा. अरविंद मिश्र, ने इस संकलन में इन तमाम बातों को ध्यान में रख कर भारतीय संदर्भ की सच्ची कहानियां लिख कर इस पृष्ठभूमि के साथ न्याय किया है।

संकलन की कहानियां विविध विषयों पर लिखी गई हैं जिसके कारण इनमें से हर कहानी का अपना अलग स्वरूप और पृथक पहचान बन गई है। ये विज्ञान कथाएं उम्र पर नियंत्रण से लेकर साइबर वल्र्ड में अपराधी की पहचान, जीवन खो चुके ग्रह की एकमात्र प्रतिनिधि की त्रासदी, भविष्य में टिहरी के भूकंप से गंगा के लुप्त हो जाने और नदी महाजल योजना से उसे पुनः प्रवाहमान बनाने, भारतीय परंपरा व संस्कारों के दर्शक एलियन, समाज में माता-पिता और अन्य बुजुर्गों से दूर होती जा रही संतानों, देह से परे-चेतना के अस्तित्व, टाइम मशीन से भविष्य में जाकर जीन षड्यंत्र को विफल करने के प्रयास, चुनाव में प्रौद्योगिकी विकास का झांसा देकर सत्ता हथियाने के कुचक्र, जीन रूपांतरित बीजों से पैदा हुई किसानों की विवशता और उनके शोषण, यम के बहाने समय को परिभाषित करने और जैव प्रौद्योगिकी की तकनीक से मनचाही संतान पैदा करने का परिणाम आदि समस्याओं पर लिखी गई हैं। इन कथाओं में हमारा देश-काल, हमारी परंपराएं, सोच और समस्याएं परिलक्षित होती हैं। इन्हें पढ़ते हुए हम कहीं न कहीं अपनी जमीन से जुड़े रहते हैं।

संकलन की विज्ञान कथाएं हैं: अलविदा प्रोफेसर, अंतर्यामी, अंतिम संस्कार, कुंभ के मेले में मंगलवासी, मोहभंग, चिर समाधि, अमरावयम, सब्जबाग, अन्नदाता, स्वप्नभंग और आगत अतीत। लेखक ने भूमिका के रूप में विज्ञान कथा विधा के उत्तरोत्तर विकास का भी चित्रण किया है। डा. अरविंद मिश्र ने विज्ञान कथा साहित्य का गंभीरता पूर्वक स्वाध्याय किया है और उनमें इस विधा में अपने चिंतन से मौलिक सृजन करने की मेधा है। जैसा कि मैं उनसे सदा कहता रहा हूं- उन्हें विज्ञान कथा के सृजन पर अपनी और अधिक ऊर्जा केन्द्रित करनी चाहिए। (हालांकि वे भी मुझसे यही अपेक्षा करते रहे हैं)। हिंदी विज्ञान कथा साहित्य को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। इस दिशा में उनकी हर रचना हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि करेगी और यह उनका ऐतिहासिक योगदान होगा।

हिंदी विज्ञान कथाओं के वीरान रेगिस्तान में इस नखलिस्तान के प्रकाशन के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया को हार्दिक बधाई।


डॉ. ज़ाकिर अली रजनीश

हिन्दी में विज्ञान कथा की परम्परा यूं तो 100 साल से भी अधिक पुरानी है, किन्तु आज भी विज्ञान कथाकारों के नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। जिस प्रकार हिन्दी की प्ररम्भिक विज्ञान कथाएं (आश्चर्य वृत्तांत-अम्बिका दत्त व्यास, 1884-88 एवं चंद्रलोक की यात्रा-केशव प्रसाद सिंह, 1900) पाश्चात्य विज्ञान कथाकारों की रचनाओं से प्रभावित रहीं और हिन्दी की मौलिक विज्ञान कथा (आश्चर्यजनक घण्टी- सत्यदेव परिव्राजक, सन 1908) के सामने आने में काफी समय लगा, उसी प्रकार आज भी विज्ञान कथाएं तो यत्र-तत्र देखने को मिल जाती हैं, किन्तु मौलिक और प्रभावी विज्ञान कथाओं को पढ़ने के लिए काफी इंतजार करना पड़ता है।

ऐसे परिप्रेक्ष्य में ‘कुंभ के मेले में मंगलवासी‘ नामक विज्ञान कथा संग्रह का सामने आना एक सुखद अनुभूति है। इस विज्ञान कथा संग्रह के लेखक डॉ0 अरविंद मिश्र विज्ञान कथा के चर्चित हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति के सचिव भी हैं। आलोच्य संग्रह नेशनल बुक ट्रस्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से प्रकाशित हुआ है, जो देश के कोने-कोने में अपनी पहुंच और पुस्तकों को कम दाम पर जन-जन तक पहुंचाने के लिए जाना जाता है।

आलोच्य विज्ञान कथा संग्रह में कुल 11 विज्ञान कथाएं संग्रहीत हैं, जो अपने भिन्न-भिन्न विषयों और रोचक प्रस्तुति के कारण पाठकों को सहज रूप में आकर्षित करती हैं। ये कहानियां जहां एक ओर जेनेटिकली माडिफायिड आर्गेनिज्म के रूप में एक एलियेन सभ्यता की विवशताओं को सामने लाती (अंतिम संस्कार) हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी राजनीतिक विद्रूपताओं (सब्जबाग) को भी अपने कथानक में समेट लेती हैं।

इसके साथ ही मनुष्य की शैशवावस्था को शीघ्र पूरा करने की जुगत (अलविदा प्रोफेसर), अपने जातीय पहचान को अमर करने की ललक (अमरा वयम), वैज्ञानिक खोजों की सीमाओं (आगत अतीत) और जीन प्रौद्योगिकी के खतरों (अन्नदाता) सहित सामाजिक अपराधों और उनका निवारण (अन्तर्यामी) और मानव मन की जिज्ञासाओं (स्पप्नभंग) को भी रोचक कथानकों से कहानियों में पिरोया गया है।

इन कहानियों में जो चीज सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वह है सांस्कृतिक प्रतीकों और पौराणिक घटनाओं का कुशलतापूर्वक उपयोग। हो सकता है इस बिन्दु को लेकर लेखक पर यह आक्षेप भी लगाए जाएं कि कहीं यह विज्ञान पर धर्म की श्रेष्ठता को स्थापित करने का प्रयत्न तो नहीं, पर बावजूद इसके यह कहानियां पाठकों को बांधती हैं, उनका मनोरंजन करती हैं, उनका ज्ञानवर्द्धन करती हैं, उन्हें बेधती हैं और कई बार सोचने के लिए भी विवश करती हैं। यह डॉ0 मिश्र की अपनी विशिष्ट शैली है, जो अन्यत्र बहुत कम देखने को मिलती है।

इससे पूर्व भी डॉ0 मिश्र प्रणीत ‘एक और क्रौंचवध‘ तथा ‘राहुल की मंगल यात्रा‘ विज्ञान कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और विज्ञान कथा प्रेमियों में काफी सराहे गये हैं। आलोच्य विज्ञान कथा संग्रह उसी कड़ी की एक अभिनव प्रस्तुति है, जो लम्बे समय तक एक श्रेष्ठ प्रतिनिधि भारतीय विज्ञान कथा संग्रह के रूप में अपनी पहचान बनाए रखेगा .

नेशनल बुक ट्रस्ट ने अपनी ख्याति के अनुरूप पुस्तक को शानदार कलेवर में प्रस्तुत किया है और मात्र 55 रुपये में इसे उपलब्ध कराकर विज्ञान कथा प्रेमियों को एक शानदार तोहफा प्रदान किया है। इस रोचक कथा संग्रह के लिए लेखक और प्रकाशक दोनों ही बधाई के पात्र हैं।
पुस्तक- कुंभ के मेले में मंगलवासी
लेखक- डॉ. अरविंद मिश्र
प्रकाशक- नेशनल बुक ट्रस्ट, नेहरू भवन, 5, वसंत कुंज, इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली-110070
पृष्ठ सं.- 69
मूल्य- रू. 55 मात्र।


Thursday, February 20, 2014

केरल में संपन्न हुआ अंतराष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मलेन

विगत १४-१६ फरवरी २०१४ को केरल राज्य के एर्नाकुलम शहर के प्रतिष्ठित संत टेरेसा कालेज में "ऐन इन्टरनेशनल कांफेरेंस आन पापुलैराईजिंग साईंस रायटिंग ऐंड सेलिब्रेटिंग साईंस फिक्शन " थीम पर आयोजित कार्यक्रम केरल राज्य में  अपने ढंग की अनूठी पहल रही। भारत के विभिन्न प्रांतों और भाषाओं -हिंदी, मलयालम ,तमिल ,तेलगू ,कन्नड़ ,मराठी ,बंगाली आदि के प्रतिनिधियों और विदेशी विज्ञान कथाकारों /समीक्षकों ने इसमें प्रतिभाग किया।  लन्दन के रिचमोंड अमेरिकन इंटरनेशनल युनिवेर्सिटी से प्रोफ़ेसर डोमिनिक अलेसिओ  और बेल्जियम के सुप्रसिद्ध विज्ञान  कथाकार फ्रैंक रोजेर  आयोजन के प्रमुख केन्द्रबिंदु रहे। उद्घाटन सत्र में अरविन्द मिश्र  और पी एन कृष्णन कुट्टी(मलयालम)  को विज्ञान कथा के उनके सुदीर्घ योगदानों के लिए अंगवस्त्रम प्रदान कर सम्मानित किया गया।  केरल राज्य के सबसे युवा विज्ञान कथाकार वेंकटेश विजय को उनके पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित कृति "द ब्लेक्स :द ग्रीक मिशन " पर सम्मानित किया गया।  डॉ राजशेखर भूसनूरमथ की सद्य प्रकाशित विज्ञान कथा पुस्तकों -न्यूटन्स कैट और आर्ट ऐंड क्राफ्ट ऑफ़ साईंस फिक्शन राईटिंग का भी विमोचन इसी सत्र में किया गया।  
 उद्घाटन सत्र फ़ोटो सेशन 

आयोजन  के दौरान विभिन्न सत्रों में लगभग डेढ़ सौ पर्चे विभिन्न समान्तर सत्रों में पढ़े गए जो विज्ञान कथा के विभिन्न पहलुओं को समाहित किये हुए थे। मुख्यतः विज्ञान कथाओं के शिल्प और स्वरुप , रामराज्यीय संकल्पनाएँ (युटोपिया) और नारकीय परिदृश्यों (डिस्टोपिया) , मिथकों और विज्ञान कथा के अंतर्संबंधों,  विज्ञान  कथाओं में आशावाद और निराशावाद आदि पर पढ़े गए शोध पत्रों पर व्यापक चर्चा हुयी।  सबसे अधिक जोर विज्ञान  कथा को परिभाषित करने पर रहा किन्तु जैसा कि अपेक्षित था इस विधा की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं उभर सकी। केरल में अब तक विज्ञान की खोजों/अन्वेषणों को भी कहानी के माध्यम से प्रस्तुतीकरण को विज्ञान कथा माना जाता रहा है जो वस्तुतः इस विषयक वैश्विक मान्यता से विपरीत है , विज्ञान कथायें दरअसल मौजूदा/समकालीन  समाज ,प्रौद्योगिकी आदि की चर्चा के बजाय किसी सर्वथा अनदेखे समाज और दुनिया का काल्पनिक चित्रण करती हैं।  भले ही वे मौजूदा समाज और प्रौद्योगिकी से वे प्रेरित हुयी हों।  जबकि सी एम् एस कालेज कोट्टायम के सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर एस शिवदास का प्रबल मत था कि " कोई भी फिक्शन जो विज्ञान का प्रभावी संचार करता हो विज्ञान कथा का एक मॉडल है" . जबकि केरल के ही सुप्रसिद्ध विज्ञानं संचारक जी  एस उन्नीकृष्णन नायर का मत इसके विपरीत था और उनके अनुसार भविष्य दर्शन विज्ञान कथाओं का एक अनिवार्य तत्व है।  इस मामले में प्रतिभागियों और श्रोताओं के बीच कई बार गर्मागर्म किन्तु निष्कर्षहीन बहस हुयी।


श्री टी पी श्रीनिवासन (आई.ऍफ़ एस एवं पूर्व राजदूत ) ने अरविन्द मिश्र को सम्मानित किया
एक सत्र विज्ञान कथाकारों के बीच एक परिचर्चा को समर्पित रहा जिसकी अध्यक्षता अरविन्द मिश्र  ने की।  इसमें डॉ राजशेखर भूसनूरमथ (कर्नाटक ) ,डॉ एम् के प्रसाद , डॉ डोमिनिक अलेसिओ ,फ्रैंक रोजेर , एन डी रामकृष्णन , संतोष कुमार (कर्नाटक ) नेल्लई एस मुत्थु (तमिलनाडु ) ,पी एन कृष्णकुट्टी ,वेंकटेश विजय आदि सम्म्लित रहे।  मुख्य विचार बिंदु यह रहा कि क्या विज्ञान कथा के कुछ सार्वभौम संकेतक नियत हो सकते हैं जो हर देश -काल,  परिस्थिति और समाज में मजूद हों? या फिर अपने सांस्कृतिक अवयवों के चलते वे बिल्कुल भिन्न भी हो सकती हैं ? जैसे भारतीय विज्ञान कथाएँ मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत ,सुखान्त और मिथकों से प्रेरित होकर अपनी एक अलग पहचान बनाये रख सकती हैं।  विज्ञान कथाओं में मानवीय प्रेम ,सरोकार एक समान संकेतक हो सकता है जो सभी मानव कृत विज्ञान कथाओं में सहज ही समाविष्ट रह सकता है -हाँ रोबोट द्वारा लिखी विज्ञान कथा में हो सकता है मानवीय संवेदना का अभाव हो या फिर उनमें भी मानवीय संवेदनाओं का सहसा ही प्रगटन हो सकता है -इन बिंदुओं को लेकर रोचक चर्चा हुई।  

यह आयोजन भारतीय विज्ञान कथा अध्ययन समिति वेल्लोर के सहयोग से आयोजित हुआ।  इसके अध्यक्ष डॉ के एस पुरुषोत्तमन और महामंत्री डॉ श्रीनरहरि ने समिति के अवदानों की चर्चा की। केरल राज्य में इस आयोजन ने विज्ञान कथा प्रेमियों के लिए वहाँ एक नए युग का सूत्रपात किया है।  इस आयोजन में भाग लेकर मैं बहुत अच्छा अनुभव कर रहा हूँ।  

Sunday, August 11, 2013

विज्ञान कथाओं का परिदृश्य!



भारत में सदियों से कहानी कहने सुनने का प्रचलन है...दादा, दादी की कहानियाँ दर पीढ़ी बच्चों ने सुनी है, भले ही उनमें ज्यादातर परीकथाएँ रही हों मगर वे अपने समय की मजेदार कहानियाँ रही हैं.. तब मानव का विज्ञान जनित प्रौद्योगिकी से उतना परिचय नहीं हुआ था. नतीजन परी कथाओं में फंतासी और तिलिस्म का बोलबाला था मगर वैज्ञानिक प्रगति के साथ ही नित नए नए गैजेट, आविष्कारों, उपकरणों, मशीनों की लोकप्रियता बढ़ी, लोगों के सोचने का नजरिया बदला और बच्चों को भी यह समझते देर नहीं लगी कि परियाँ, तिलस्म, जादुई तजवीजें सिर्फ कल्पना की चीजे हैं। आज आरंम्भिक कक्षाओं के बच्चों को भी यह ज्ञात है कि चन्द्रमा पर कोई चरखा कातने वाली बुढि़या नहीं रहती बल्कि उस पर दिखने वाला धब्बा दरअसल वहां के निर्जीव गह्वर और गड्ढे हैं, अपनी धरती को छोड़कर इस सौर परिवार में जीवन की किलकारियां कहीं से भी सुनायी नहीं पड़ी हैं..आज मनुष्य अन्तरिक्ष यात्राएं करने लग गया है और सहसा ही अन्तरिक्ष के रहस्यों की परत दर परत हमारे सामने खुल रही है।

ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति (1750 से 1850) ने मनुष्य को सहसा ही मशीनों की ताकत का अहसास दिलाया, रेल पटरियों पर दैत्याकार भाप के इंजन वाली रेल दौड़ी तो लोगों में भय और विस्मय का संचार हुआ..स्विच दबाने मात्र से अँधरे को छूमंतर करने वाली बिजली ने विशाल मशीनों में भी प्राण फूंक दिया और उनके संचालन का जिम्मा खुद संभाल लिया। मनुष्य को शारीरिक श्रम से बच रहने और आरामदायक जीवन का विकल्प अब सामने था.. मगर तभी कुछ विचारवान लोगों के मन में शंकाएं भी उभरीं-कहीं ये मशीनें मनुष्य की अहमियत को खत्म तो नहीं कर देंगी? मतलब कहीं मनुष्य को मशीने विस्थापित तो नहीं कर देंगी ? उसे बिना काम धाम का निठल्ला तो नहीं बना देगीं ?.. और सबसे बढ़कर यह है कि कहीं मशीने खुद मसीहा तो नहीं बन उठेगीं ? कहीं वे स्वयंभू बन मनुष्य के अधिपत्य को ही तो चुनौती नहीं दे डालेंगी ? मनुष्य के यही आरम्भिक संशय जल्दी ही एक साहित्यिक अभिव्यत्ति का सूत्रपात करने वाले थे जिसे कहानी की एक नयी विधा के रूप में पहचाना जाना था, यह थी विज्ञान कथाओं (साईंस फिक्शन) की आहट.. यह उन्ही दिनों की बात है जब मेरी शेली जो जानेमाने कवि पर्सी बिसी शेली की पत्नी थीं ने अपना पहला उपन्यास लिखा था- फ्रैन्केंन्स्टीन (1818) और उसमें विज्ञान के प्रति ऐसी ही आशंकाएं मुखरित हुयी थीं, आज यह उपन्यास पहले आधुनिक विज्ञान कथा की पदवी से सुशोभित है। मशहूर अमेरिकी विज्ञान कथाकार आईजक आजिमोव (1920-1992) इसलिए ही लिखते हैं कि विज्ञान कथा साहित्य की वह विधा है जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रभावों के प्रति मानवीय प्रतिक्रिया को कुरेदती है, अभिव्यक्ति देती है।

विगत दो शताब्दी के चतुर्दिक वैज्ञानिक-प्रौद्योगिक विकास ने मनुष्य के सामने अनेक रहस्यों का अनावरण किया .. उसने प्रकृति के नए रूपों, नयी शक्तियों से परिचय कराया है। अंतरिक्ष से जुड़े तमाम रहस्यों से पर्दा उठने के बाद गल्पकारों और कथा-नवीसों को फैंटेसी के लिए जैसे एक नया आयाम मिल गया.. आज शायद सबसे अधिक विज्ञान कथाएं अन्तरिक्ष पर लिखी जा रही हैं-उनको एक नया नामकरण ही दे दिया गया है स्पेस ओपेरा..मगर आज की बेतहाशा प्रौद्योगिकी-प्रगति ने मानव अन्वेषण के कितने ही नए द्वार खोल दिए हैं..आज क्लोनिंग, स्टेम सेल, नैनोटेक्नोलोजी के साथ ही दीर्घजीविता ही नहीं अमरता की भी गुत्थी सुलझााने में वैज्ञानिक दिन रात लगे हुए हैं। इन अनुसंधानों का मनुष्य के जीवन या फिर पूरे मानव समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? क्लोनिंग जैसी तकनीक अगर ओबामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी के हाथ लग गयी तो क्या वह खुद अपना ही क्लोन बनाना नहीं चाहेगा? कुछ कुछ वैसा ही दृश्य उपस्थित नहीं हो जायेगा जैसे पुराणोक्त महिषासुर के साथ देवी दुर्गा के युद्ध में उस दानव के एक एक रक्त बूँद से एक नया महिषासुर उत्पन्न हो रहा था?.. ऐसा अगर हो जाय तो कितनी मुसीबत आ खड़ी हो जायेगी-एक ही लादेन मानवता के लिए बड़ी समस्या था.. सैकड़ो लादेन ? यह एक भयावह कल्पना है.. मगर क्लोनिंग सरीखी प्रौद्योगिकी इसे दुर्भाग्य से साकार कर सकती है क्लोनिंग पर ऐसी विज्ञान कथायें प्रकाशित हो चुकी हैं जो हमें इस तकनीक के अनेक अँधेरे उजाले पहलुओं से वाकिफ कराती हैं।

विज्ञान कथाकार हमें वैज्ञानिक तकनीकों के नकारात्मक पहलुओं से आगाह भी करता है ताकि समय रहते हम ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना कर सकें-ठीक वैसे ही जैसे पुराकथाओं में कोई न कोई देवी- देवता मानवता के त्राण के लिए आ प्रगट होता है! अब पहले वैज्ञानिक उपन्यास फ्रैन्केन्स्टीन को ही ले लें- इसका भयावह दानव सरीखा पात्र खुद अपने जन्मदाता डाॅ0 फ्रैन्केन्स्टीन की ही जान लेने पर तुल जाता है और उसका धरती के कोने-कोने तक पीछा करता चलता है और आखिर जन्मदाता होने के बावजूद डाॅ0 फ्रैन्केन्स्टीन को काल कवलित होना पड़ता है- एक दुखांत कथा है यह ..मगर ऐसी ही एक कथा हमारे पुराणों में भी है भस्मासुर की जो खुद अपने वरदानदाता शिव की जान लेने को उद्यत हो जाता है. शिव भागे भागे फिरते हैं मगर अंततः विष्णु उनकी रक्षा में आ जाते हैं- कहानी सुखान्त बन जाती है भारतीय पुराण कहानियां पश्चिम की ज्यादातर दुखान्त कहानियों की तुलना में सुखान्त है- कोई न कोई यहाँ मानवता के त्राण के लिए ऐन वक्त पर आ पहुंचता है- विज्ञान कथाकारों को भी अपनी कहानियाँ में समस्याओं से निजात की संभावनाओं को उकेरना चाहिए.. यह एक विचारणीय पहलू है.

आज हमारे देश के सामने अनेक चुनौतियां हैं। गरीबी उन्मूलन, बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों की पूर्ति सब के लिए स्वास्थ्य और साथ में प्रदूषण, ग्लोबल वर्मिंग जैसी विश्व व्याप्त समस्याएं और कितनी ही त्रासदियाँ। नागासाकी हिरोशिमा का दंश हम आज भी झेल रहे हैं- विमान जो यात्रियों को ढ़ोने के लिए बनाए गए थे अचानक बम वर्षा करने लगे.. आम लोगों को इसका तनिक पूर्वाभास न था मगर विज्ञान कथाकारों ने 1945 के पहले ही ऐसी दहशतनाक संभावनाओं की ओर इशारा कर दिया था.. और नागासाकी हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद पहली बार लोगों ने विज्ञान कथाकारों को गम्भीरता से लेना शुरू किया.. विज्ञान कथाकार भविष्य की टोह लेने की प्रज्ञा लिए होता है वह मौजूदा प्रविधियों जुगतों पर नजर गड़ाते हुए भविष्य में इनके उपयोग दुरपयोग की संभावनाओं की आहट लेता है- और अपनी कहानियों में उनका जिक्र करता है- उसकी भविष्यवाणियां सच हो उठती हैं मगर कुछ गलत भी हो सकती हैं- वह भविष्यवक्ता थोड़े ही है, वह तो एक वैज्ञानिक पद्धति, सोच के जरिये भविष्य में झांकता है और दूर की कौड़ी ला देता है, मगर वह कोई नजूमी नहीं है।

भारत में वैसे तो विज्ञान कथायें विगत उन्नीसवी सदी से लिखी जानी शुरू हुईं जैसे अब तक की ज्ञात पहली हिन्दी विज्ञान कथा ’आश्चर्य वृत्तांत’ अम्बिका दत्त व्यास ने लिखी थी जिसे उन्होंने तत्कालीन पत्रिका पीयूष प्रवाह में धारावाहिक रूप से 1884 में लिखना शुरू किया था आगे मशहूर साहित्यिक पत्रिका ’सरस्वती’ ने वर्ष 1900 से विज्ञान कहानियों को कभी कभार प्रकाशित करना आरम्भ किया, मगर इन कहानियों पर पश्चिमी विज्ञान कथाकारों का बहुत प्रभाव था.. एक समय था जब एच-जी-वेल्स, जूल्स वर्न, एडगर एलन पो जैसे साहित्यकारों ने अपने वैज्ञानिक साहित्य द्वारा न केवल योरप और अमेरिका बल्कि सम्पूर्ण विश्व पर अपनी लेखनी का अमिट प्रभाव छोड़ा था। अनेक किशोरों ने उन कहानियों को पढ़कर वैज्ञानिक बनने का निश्चय किया और आगे चलकर देश की तरक्की में भागीदार बने। आज भी विज्ञान कथाओं पर आधारित जुरासिक पार्क, द मैट्रिक्स और स्टार वार्स जैसी फिल्मों का नाम तो बच्चे बच्चे की जबान पर है।

भारत में विज्ञान कथाओं के प्रति साहित्यकारों की जैसे एक अरूचि सी बनी रही है यद्यपि आचार्य चतुरसेन शास्त्री, डाॅ0 सम्पूर्णानन्द, राहुल सांकृत्यायन जैसे जानेमाने साहित्यकारों ने मौलिक विज्ञान कथाएं, उपन्यास लिखकर इस ओर साहित्यकारों का ध्यान आकर्षित किया था.. मगर आज भी यह विधा भारत में उपेक्षित सी ही है किन्तु अब विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की बढ़ती प्रगति से ऐसी कहानियों के लिए अनुकूल माहौल बन रहा है.. हमारे नजरिये, हमारी सोच पर विज्ञान जैसे जैसे प्रभाव डालता जाएगा विज्ञान कथा साहित्य में हमारी स्वयमेव रूचि होती जायेगी.. आज स्कूलों कालेजों की एक भरी पूरी पीढ़ी ऐसे ही वैज्ञानिक परिवेश में संस्कारित हो रही है- उन्हे एक ’नए तरीके का साहित्य भायेगा, विज्ञान कथायें ही उस नए तरीके के साहित्य की भरपाई करेंगी। दरअसल विज्ञान कथा आधुनिक दौर का वह वैश्विक साहित्य है जो कल्पनाओं के नये दरवाजे खोलती है। विज्ञान कथाएं वैज्ञानिक प्रगति के सामाजिक प्रभावों का अवलोकन करती हैं और साथ ही इसके जरिये वैज्ञानिक प्रगति की सही दशा और दिशा का भी निर्धारण करती हैं ताकि विज्ञान मानव जाति के कल्याण के लिए हो, न कि विनाश के लिए। विज्ञान कथाएं विज्ञान को साहित्य और आम जनमानस से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी हैं। आज अमेरिका साइंस और टेक्नालाजी के मामले में सबसे आगे है तो इसके पीछे विज्ञान कथाओं एवं सम्बन्धित साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है।

भारत में वैज्ञानिक जागरूकता उत्पन्न करने में विज्ञान कथाएं महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। इस विधा द्वारा न केवल आम जन मानस में वैज्ञानिक जागरूकता पैदा की जा सकती है बल्कि आम तौर पर शुष्क माने जाने वाले विज्ञान को मनोरंजन के एक शक्तिशाली साधन है। के रूप में विकसित करते हुए सम्पूर्ण देश में विज्ञानमय वातावरण बनाया जा सकता है। आज विकसित देशों के निवासी विज्ञान कथाओं व फिल्मों को अपनी पसंद में पहली प्राथमिकता देते हैं और इसीलिए विज्ञान उनके लिए शुष्क विषय न होकर मनोरंजन का साधन नतीजन वे विज्ञान के क्षेत्र में दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की कर रहे हैं। एक सवाल ये उठता है कि विज्ञान कथाएं किस प्रकार की हों। दरअसल किसी भी विज्ञान कथा की पहली शर्त है, उसका रोचक होना। अगर इसमें भी विज्ञान का शुष्क वर्णन कर दिया जाये तो कोेर्स की किताबों और विज्ञान कथा में कोई फर्क नहीं रह जायेगा, किसी भी कथा को रोचक बनाने के लिए उसमें कुछ फ्लेवर्स मिलाये जाते हैं। जैसे जरूरत के मुताबिक नौ रसों (श्रृंगार, वीर, हास्य, रौद्र......इत्यादि) का उपयुक्त मिश्रण, कहानी का कसा हुआ उतार चढ़ाव, पात्रों व माहौल का चुनाव आदि। विज्ञान कथा उन सभी रूपों में लिखी जा सकती है जो लोगों के बीच लोकप्रिय हो, जैसे कि लघु कथा, उपन्यास, नाटक, कामिक्स, झांकी, टी0वी0 धारावाहिक स्क्रिप्ट, फिल्म, स्क्रिप्ट, कविता इत्यादि कोई भी विधा विज्ञान कथा का प्रतिनिधित्व कर सकती है। विज्ञान कथा सामाजिक हो सकती है, सस्पेंस हारर या जासूसी हो सकती है या फिर पूर्णतः कामेडी हो सकती है। जरूरत है बस उसमें वैज्ञानिक तथ्य खूबसूरती व रोचकता के साथ शामिल करने की।

विज्ञान कथा विधा देश में विज्ञान संचार के एक ऐसे ही माध्यम के रूप में विकसित होती दिखाई दे रही है जो अत्यन्त शक्तिशाली है और विज्ञान संचार को एक आन्दोलन के रूप में परिवर्तित कर सकने में सर्वथा समर्थ है। यह भारतीय विज्ञान के प्रति आकर्षण पैदा करेगी। यह भविष्य की वैज्ञानिक प्रगति की झलक भी दिखायेगी और विज्ञान के समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्वावलोकन भी। बस जरूरत है इसे योजनाबद्ध ढंग से विकसित व प्रमोट करने और इसे अन्य विधाओं अर्थात, नाटक, सीरियल, फिल्म इत्यादि के साथ सम्बद्ध करने की। साथ ही साथ समाज में फैले हुए अंधविश्वास को दूर करने एवं वैधानिक नजरिये के विकास में सामाजिक कथाएँ काफी सहायक हो सकती है। आज जिस गति से हमारा देश वैज्ञानिक प्रगति कर रहा है और आम आदमी के जीवन में वैज्ञानिक यंत्रो/उपकरणों की आमद होती जा रही है, ऐसे में विज्ञान कथा की लोकप्रियता बढ़ना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। अगर हम गहराई से देखें तो कह सकते हैं कि बच्चो को अतार्किक एवं भ्रमपूर्ण चीजों से दूर रखने, उनके भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करने तथा उनके मस्तिष्क के समग्र विकास के दृष्टिकोण से विज्ञान कथाएँ अत्यंत ही उपयोगी साबित होगीं.
नोट : यह आलेख  नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित मेरी पुस्तक ' कुम्भ के मेले में मंगलवासी'  की भूमिका से उद्धृत है! अतः  बिना मेरे या नेशनल बुक ट्रस्ट की अनुमति के पूर्णतः या अंशतः कहीं प्रकाशित करना कापीराईट नियमों का उल्लंघन हो  सकता है! 

Saturday, July 6, 2013

'कुंभ के मेले में मंगलवासी' विज्ञान कथा संकलन का विमोचन

विगत दिनों विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद, नई दिल्ली और तस्लीम, लखनऊ तथा नेशनल बुक ट्रस्ट नयी दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में अरविन्द  मिश्र के नए विज्ञान कथा संग्रह 'कुंभ के मेले में मंगलवासी' का विमोचन रायबरेली उत्तरप्रदेश में संपन्न हुआ . विमोचन समारोह  का संचालन नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक पंकज चतुर्वेदी ने किया। इस अवसर पर डॉ0 जाकिर अली रजनीश ने मशहूर ब्लागर   बी0एस0 पाबला  द्वारा प्रेषित पुस्तक समीक्षा का पाठ किया। उन्‍होंने कहा कि यह पुस्तक विज्ञान कथाओं के बारे में पाठकों के मन में उत्कंठा जगाती है। आशा है इससे पाठकों के मन में विज्ञान कथाओं के प्रति रूचि जाग्रत होगी। 

    बी0एस0 पाबला  द्वारा प्रेषित पुस्तक समीक्षा का पाठ
अब तक मैं पुस्तकों को अपने ज्ञानवर्धन, मनोरंजन, भाषाई समझ के लिए पढ़ते समझते आया हूँ। किसी पुस्तक की समीक्षा का यह मेरा पहला अवसर है, पता नहीं पंकज चतुर्वेदी जी, डॉ जाकिर और डॉ अरविंद की अपेक्षाओं  के पैमाने पर कहाँ तक पहुँच पाऊँगा? 

69 पृष्ठों में सिमटी 11 विज्ञान गल्प कथायों वाली 'कुंभ के मेले में मंगलवासी' के पृष्ठ पलटने शुरू किए तो साढ़े पांच पृष्ठों की भूमिका देखते ही मैं नर्वस हो गया। अगर आगाज़ ऐसा है तो अंजाम कैसा होगा!दादा-दादी की कहानियों से शुरू हो ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति से होती हुई मशीनों द्वारा मनुष्य पर विजय का भय दिखाती नैनो टेक्नोलॉजी सहित क्लोनिंग के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती डॉ अरविन्द मिश्र लिखित यह भूमिका सुखांत भारतीय पौराणिक कथायों व विज्ञान के दुरूपयोग का उदाहरण भी दर्शाती है।

विज्ञान कथायों के प्रकाशन का इतिहास तथा भारत में इसकी विभिन्न विधाओं पर प्रकाश डालती यह भूमिका अपने अगले पृष्ठों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेखन में समाहित किए जाने का आग्रह करते, अपने सहयोगियों का आभार प्रकट करते समाप्त होती है.अब यदि मैं डॉ अरविन्द मिश्र द्वारा लिखित सभी 11 कथायों की बात करूंगा तो मामला बहुत लंबा खिंच जाएगा। इसलिए, जैसे बोलचाल की भाषा में पकते चावल की हांडी से एक दाना निकाल कर जांचा जाता है वैसे ही कोशिश करता हूँ क्रमरहित पढी गई 3 कथाओं  के प्रभाव की. 

पुस्तक की आठवीं कथा है 'सब्जबाग'. एक ऎसी कथा जिसका आरंभ विरोधी राजनैतिक पार्टी की बैठक से होता है और जिसमें सक्रिय राजनीति अपना चुके नोबेल पुरस्कार नामांकित वैज्ञानिक द्वारा प्रचलित घिसे पिटे मुद्दों की बजाए टेक्नोलॉजी के मुद्दे पर जोर देते हुए घोषणा पत्र जारी करने का सुझाव दिया जाता है।
घोषणा पत्र है भी मजेदार। हर घर को दूरसंचार से जोड़ने, एक संपूर्ण केन्द्रीय शिक्षा पाठ्क्रम द्वारा सारे देश में इंटरनेट के सहारे एक समान पढ़ाई, सौर ऊर्जा तकनीक आधारित वायु परिवहन, फसलों के विपणन हेतु व्यापक वैश्विक व्यवस्था जैसे मुद्दों पर विशेष जोर दिया जाता है. चुनाव होने पर अप्रत्याशित रूप से यह पार्टी चुनाव जीत जाती है और देशवासी हमेशा की तरह इन मुद्दों के साकार होने की उम्मीद में जीते रहते हैं।

दिवास्वप्न दिखा कर अपना उल्लू सीधा करने वालों की मानसिकता पर प्रहार करती कहानी का संदेश साफ़ दर्शाता है कि भले ही हम तकनीकी विकास की ओर बढ़ रहें हैं किन्तु मूल मानवीय भावनायों का दोहन शायद ख़त्म ना हो. 

अगली कथा 'अंतर्यामी' का क्रमांक पुस्तक में दूसरे स्थान पर है। 2045 में अपराध मुक्त भारत की घोषणा के बाद 2075 में ब्रेन प्रिंट, डिजिटल फेंसिंग जैसी व्यवस्थायों के बीच शहर में हुए तिहरे हत्याकांड की जांच करते एक पुलिस अधिकारी ने जब यह जानकारी दी कि एक नवजात शिशु का ब्रेन प्रिंट खतरनाक अपराधी से मिलता है और उसे भी उन 15 करोड़ अपराधियों जैसे अलग द्वीप में रहने भेज दिया गया है तब भी सभी को चिंता थी कि इतने कड़े कदमों के बाद भी सभ्य समाज में यह अपराध कैसे हो गया.कोई सुराग ना मिलता देख पुलिस के मुखिया, अंतर्यामी नामक एक सुपर कंप्यूटर की शरण में जाते है जो उन पंद्रह करोड़ खतरनाक अपराधियों का डाटा बैकअप से मिलान करने पर एक अपराधी के गायब होने की घोषणा करता है और उसकी छद्म पहचान भी बता देता है। हत्याओं का कारण बताया जाता है उस अपराधी द्वारा उन्नत सुरक्षा प्रणाली द्वारा अपने छद्म रूप की पहचान करने की परख का पैमाना जांचना।

मुझे यह कथा एक सटीक संदेश देने में असफल लगी. कथावस्तु भी कमजोर लगी तथा बिना किसी उचित परिणाम के अचानक समाप्त हुई कथा ने कंप्यूटर को धन्यवाद देते एक पारंपरिक भारतीय मानसिकता का ही नज़ारा पेश किया 'अन्नदाता' शीर्षक से लिखी गई कथा पुस्तक के दसवें स्थान पर है। ब्रह्मांडीय सम्राट के रूप में कृत्रिम महाबुद्धि वाले एक महा-रोबोट की सभा में एक मानव वैज्ञानिक सलाहकार लोगों के भूख से बिलबिलाने की बात करता है तो मुझे चौंकना पड़ा. टिश्यू कल्चर की सहायता से अन्न के भण्डार भरने की सलाह देते वैज्ञानिक से इतर दूर कहीं टर्मिनेटर बीजों से उत्पन्न अनाज को ऊंचे दामों में बेचने की जुगत भिडाता व्यवसायी भी आज की ही गाथा गढ़ता दिखा. 

लेकिन पारंपरिक फसलों को पुन: बीजों के रूप में उपयोग करने को लालायित किसान को संत महात्मा की शरण में जाते देख एक बार फिर मुझे भारतीय मानसिकता के, मानस पटल पर गहरे तक धंसे होने का आभास हुआ। उन महात्मा द्वारा आश्चर्जनक रूप से पारंपरिक बीज उपलब्ध करवा देना उतना मायने नहीं रखता जितना प्रकृति से छेड़छाड़ ना करने का संदेश झकझोरता है।
 विमोचन 

इन तीनों कथायों में अपने पारंपरिक मूल्यों व संपदा को बचाए रखने की छटपटाहट  साफ़ नज़र आती है और डॉ अरविन्द मिश्र ने इसे दर्शाने में कोई झिझक भी नहीं दिखाई है.2013 की प्रथम संस्करण वाली पुस्तक के हाथ में आते ही सुखद आश्चर्य हुआ इसकी कीमत को लेकर महज 55 रूपयों में आध्यात्म, धर्म आस्था जैसी भारतीय मूल्यों को समेटती 11 गल्प कथाएं अपने मूल उद्देश्य को प्रकट करने में कोई कसर नहीं छोड़तीं
नॅशनल बुक ट्रस्ट के सौजन्य से यह विज्ञान कथा संकलन 'कुंभ के मेले में मंगलवासी' अपने उद्देश्य में सफल हो यही कामना
-बी एस पाबला
भिलाई, छत्तीसगढ़

Saturday, May 4, 2013

बच्चों के लिए विज्ञान कथा -सपने का सच

बच्चों के लिए विज्ञान  कथा
सपने का सच
इधर कुछ दिनों से रोहित को अजीबोगरीब सपने दिखाई दे रहे थे। कभी तो वह देखता कि वह किसी पहाड़ की चोटी पर खड़ा है और नीचे की वादियों में उड़ रही चिड़ियों की गिनती कर रहा है या फिर किसी बड़ी सी चिड़िया की पीठ पर सवार होकर वह खुद भी आसमान में ऊँचे और ऊँचे उड़ता जा रहा है। हद तो तब हो गई जब एक दिन उसने देखा कि वह खुद ही उड़ने लगा है। सपने में ही वह कुछ चिड़ियों के जमीन पर उछल कर उड़ने के तरीके को ध्यान से देख रहा है और उसी तरह खुद भी उछलते हुए हवा में ऊपर और ऊपर उड़ चला है। वह हाथों को चिड़ियों के डैनों की तरह फैलाते और सिकोड़ते हुए उड़ रहा है और आगे बढ़ता जा रहा है। वह अपने घर के ऊपर उड़ता-उड़ता आ गया है, फिर उड़कर सामने के नीम के पेड़ से भी ऊँचा उठ गया है, जहाँ से वह नीचे गाँव की बस्तियों को देख रहा है। अपने गन्ने के खेत के ऊपर से गुजरते हुए गांव के किनारे पर स्कूल की बिल्डिंग की ओर बढ़ चला है। जहाँ रात का धुंधलका और सन्नाटा है। यहीं तो वह सुबह पढ़ने जायेगा। सपने में भी ये विचार उसके मन में कौंध रहे हैं। वह और आगे बढ़ाना चाहता है, लेकिन उसे डर का अनुभव होने लगता है और हवा में जल्दी-जल्दी हाथ पांव मारते हुए घर लौट चलता है। सपना पूरा हो जाता है। इन दिनों वह इसी सपने को दूसरे सपनों से ज्यादा देख रहा था। ये सभी सपने उसे सुबह उठने पर भी पूरी तरह से याद रहते। एक - एक दृश्य उसकी आँखों के सामने तैरने लगते। वह रोमांचित हो उठता।
***

“पिताजी, आज फिर मैंने वही सपना देखा। काफी देर तक आसमान में उड़ता रहा। फिर आपके बुलाने की आवाज सुनकर नीचे उतर आया।“ रोहित उस दिन सुबह उठते ही अपने पिताजी के सामने रात का सपना बयान कर रहा था।

“पर, मैने तो तुम्हे बुलाया नहीं था बेटे।“ रोहित के पिता जो गांव के प्रधान थे ने चुटकी ली।

“पिता जी, मैं सपने की बात बता रहा हूं।“ रोहित ने मचलते हुए कहा।
“अच्छा बेटे, अब सपने की बात छोड़ो, जल्दी तैयार हो जाओ स्कूल के लिए। सपने की बात फिर कर लेना।“ यह कह कर प्रधानजी घर के बाहर निकल पड़े। रोहित मन मसोस कर रह गया। दरअसल वह आज पिताजी को अपने उड़ने वाले सपने के बारे में विस्तार से चर्चा करना चाहता था... लेकिन उसकी इच्छा पूरी नहीं हो पायी। बुझे मन से स्कूल के लिए तैयार होते हुए उसने सोचा क्यों न वह अपने सपनों की चर्चा कक्षा के अध्यापक से करे। वह नवीं कक्षा का छात्र है, उसके कक्षा अध्यापक विज्ञान पढ़ाते हैं, वे जरूर उसके सपने की समस्या पर विचार करेंगे। यही सोचता विचारता हुआ वह स्कूल के प्रांगण तक जा पहुंचा, बच्चों के शोर से उसका ध्यान भंग हुआ। रेसस में वह अपने स्वप्न की चर्चा विज्ञान के अध्यापक यतींद्रजी से करेगा। उसने यह दृढ़ निश्चय कर लिया था।

“भई रोहित, तुम्हारे सपने पर तो मैं जानकारी नहीं दे पाऊंगा पर इतना जरूर बता सकता हू¡ कि धरती के गुरुत्वाकर्षण के चलते कोई भी इंसान बिना किसी उपकरण या साधन के सहारे नहीं उड़ सकता। गुरुत्वाकर्षण यानि ग्रैविटी से तो तुम परिचित ही हो। धरती प्रत्येक वस्तु को अपनी ओर खींचती है और इसके प्रभाव के चलते ही हम सतह पर टिके हैं नहीं तो अब तक अंतरिक्ष में विलीन हो जाते। तुम्हारे उड़ने की बात केवल सपने में ही सम्भव है, सचमुच ऐसा नहीं हो सकता।“ रोहित के कक्षा अध्यापक अपराºन अवकाश के समय उसकी जिज्ञासा का समाधान करने का प्रयास कर रहे थे।

“लेकिन सर, उड़ने वाला सपना ही मैं बार-बार क्यों देखता हूं!” रोहित के प्रश्न थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

“भई, मनोवैज्ञानिकों की राय में लोग वही स्वप्न देखते हैं जो वे चाहते हैं मगर वास्तव में अपनी चाहत पूरी नहीं कर पाते। मनुष्य का दिमाग बस उन्हीं मनचाही किन्तु असम्भव बातों को सपने के जरिए हासिल कर लेना चाहता है, हो सकता है तुम्हारे मन में आसमान में उड़ती चििड़यों को देखकर लगता हो कि काश तुम भी उन्हीं की तरह उड़ पाते।“ यतीन्द्र ने यह कहकर रोहित की ओर ध्यान से देखा।
“जी सर, यह तो मेरी इच्छा है कि काश मैं भी चिड़ियों की तरह उड़ पाता।“ रोहित ने तुरन्त हामी भरी।
“फिर तो सारा माजरा समझ में आ गया। जो तुम वास्तव में नहीं कर पा रहे हो, यानि उड़ नहीं पा रहे हो, स्वप्न के जरिए उसी काम को तुम्हारा मस्तिष्क अंजाम दे रहा है।“

“यस सर!” रोहित ने हामी भरी। लेकिन उसे अभी भी यही अनुभव हो रहा था कि उसकी जिज्ञासा पूरी तरह शांत नहीं हो सकी है।
***
अभी स्कूल बन्द होने में थोड़ा समय था किन्तु सरदर्द के कारण रोहित ने घर जाने की अनुमति प्रधानाध्यापक से प्राप्त कर ली। वह एक शार्टकट रास्ते से यानि नहर वाले निर्जन रास्ते से जल्दी घर पहु¡चने के लिए तेज कदमों से चल पड़ा था। अभी वह आधा फासला ही तय कर पाया था कि सहसा एक प्यारी सी आवाज सुनायी पड़ी।
“अरे भई रोहित, जरा मुझसे भी मिल लीजिए।“
“यहाँ कौन?” कहीं कोई भी तो दिखाई नहीं पड़ रहा।
“अरे, मैं तो नहर के बीचो-बीच पानी में हूं। भई रोहित, जरा नहर के मेड़ पर चढ़ो तो।“ फिर से वही मधुर आवाज सुनायी दी।

रोहित सहम गया। कहीं उसने इस नहर वाले रास्ते से चलने का निर्णय लेकर बड़ी गलती तो नहीं की है उसके पिताजी हमेशा मेन रोड वाले लम्बे किन्तु सीधे रास्ते से ही स्कूल आने-जाने के लिए कहते हैं, सहसा ही यह विचार उसके मन में कौंधा।
“अरे डरो नहीं रोहित, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ, दुश्मन नहीं। पहले तुम दांयी ओर नहर के ऊपर चढ़ो तो।“ फिर वही आवाज, जिसमें इस बार एक विशेष आमंत्रण था।
रोहित यंत्र सा खिंचा नहर की मेड़ पर चढ़ गया। उसने नहर के पानी में एक काफी बड़े आकार का मेढ़कनुमा जानवर देखा ण्ण्ण् ऐसा जानवर तो उसने कभी नहीं देखा था, वह सहसा बेहद डर गया। डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गई।
“तुम नाहक ही डर रहे हो रोहित, मैं तुम्हारे ग्रह का प्राणी नहीं हूं। मैं अन्तरिक्ष के ऐसे छोर से आया हूं जहां केवल जल ही जीवन है। इसलिए तो मुझे भी इस नहर के पानी में ही शरण लेनी पड़ी है। अब चूंकि धरती का एक तिहाई भाग ठोस धरातल है, जहां तुम जैसे थलचारी हैं और इसलिए हम तुम्हारे पास सीधे आ नहीं सकते। इसलिए तुम्हारे सपनों में ही अपनी उपस्थिति दर्ज कर संतोष कर रहे हैं।“ रोहित को मानों काटो तो खून नहीं। यह क्या माजरा है भला। सहसा उसकी समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। वहां रुके या फिर भाग चले।

“फिर से किस विचार में डूब गये रोहित, मैं तुम्हे कोई हानि नहीं पहुंचाऊंगा, अब मेरा चेहरा-मोहरा तो धरतीवासियों सा है नहीं। यदि मैं दोस्ती की पेशकश करूँ तो तुम ठुकरा दोगे।“ वह मेंढकनुमा सा होकर भी बिल्कुल इन्सानों की जुबान बोल रहा था। उसने अन्तरिक्षवासियों की कहानियाँ पढ़ी तो थीं, तो क्या सामने का जीव सचमुच कोई अन्तरिक्षवासी ही है। कोई दुश्मन अंतरिक्षवासी न होकर एक दोस्त।“ रोहित का दिमाग फिर सक्रिय हो उठा था।

“तुम जो सपने देख रहे हो वे हमारी विचार तरंगों से ही उत्पन्न हो रहे हैं। हमारे ग्रह के वासियों का एक झुंड धरती पर उतर कर यहाँ के जन-जीवन का अध्ययन कर रहा है।“

“भला क्यों?” रोहित के मुँह से अकस्मात निकल पड़ा।
“इसलिए कि हमारे यहाँ जनसंख्या बहुत अधिक हो चली है, हमें बसने के लिए कोई दूसरी जगह चाहिए और इस गैलेक्सी में तुम्हारी धरती जैसा कोई दूसरा ग्रह नहीं, यहाँ तो दो तिहाई पानी ही पानी है अनुमान यह है कि अगली दो शताब्दियों में बढ़ते तापक्रम के चलते उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की सारी बर्फ पिघल जाएगी और तब पूरी तरह जलमग्न धरती हमारे लिए स्वर्ग बन जायेगी´´

“और हमारे लिए नर्क” रोहित के मुंह से फिर अकस्मात ये शब्द फूट पड़े।

“उस स्थिति के लिए हम जिम्मेदार नहीं है रोहित, बहरहाल तुम अपने सपनों को लेकर चिंतित न होओ यह भी जान लो कि तुम्हारा स्वप्न महज एक स्वप्न भर नहीं एक हकीकत है।“

क्या?”

“जी हाँ”, रोहित हमने एक ऐसी ‘एंटी ग्रैविटान’ तरंगो की खोज कर ली है जिसकी मदद से हम दूर-दूर तक अंतरिक्ष भ्रमण कर लेते हैं। गुरुत्वाकर्षण का कोई प्रभाव हम पर नहीं पड़ता, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण नहीं है। वहां भी धरती की ही तरह गुरुत्वाकर्षण है, लेकिन एंटीग्रविटान वेब´ के नियंत्रित उपयोग से हम सुदूर अन्तरिक्ष यात्राए¡ कर लेते हैं ये तरंगे हमारे अंतरिक्ष यानों को गुरुत्व के विरूद्ध गति देती हैं।“
“तो क्या मैं भी सचमुच उड़ सकता हूं।“ अचानक रोहित के उड़ने की इच्छा बलवती हो उठी।

“ठीक है रोहित मैं अपने ग्रह-मुख्यालय से संपर्क कर आज रात तुम्हारे इर्द-गिर्द एंटी ग्रैविटी तरंगों का घेरा तैयार करूंगा। तुम रात 11 बजे के आस-पास घर के बाहर निकलना, नहीं तो घर की छत से जाकर चिपक जाओगे। अब तुम जाओ, उड़ने का आनन्द लेने के बाद मुझसे मिलना फिर और बातें होंगी। लेकिन हां, मेरे बारे में किसी को बताना नहीं, क्योंकि कोई विश्वास करेगा नहीं और कोई विश्वास कर भी ले तो उसके यहा¡ तक आने पर मैं छुप जाऊंगा-पानी के भीतर भला कौन देख पाएगा मुझे। बस तुम भले मुझसे मिल सकोगे।“ सहसा ही वह मेढ़कनुमा जीव पानी में डुबकी लगाकर अदृश्य हो गया। स्तब्ध सा रोहित इस अद्भुत घटना पर सोच विचार करता घर की ओर चल पड़ा।
***

“रोहित, रोहित उठो। कब तक सोते रहोगे आज।“ पिता जी की आवाज सुनकर रोहित उठ बैठा।

“रोहित बेटे आज मैंने भी सपना देखा कि तुम रात 11 बजे घर के बाहर निकले। मैं भी तुम्हारे पीछे-पीछे चल पड़ा। फिर मैंने देखा कि तुम एक जगह थोड़ी देर रुके रहे, फिर आसमान में ऊपर उठ चले और काफी देर तक इधर-उधर मंडराते रहे। फिर धीरे से नीचे उतर आए! भई मैं तो हैरान हूं हम तुम एक जैसा ही सपना देख रहे हैं, आखिर इसका कारण क्या है।“ रोहित के पिता जी की आवाज में चिन्ता की स्पष्ट झलक थी और रोहित इस उधड़ेबुन में था कि सपने का सच पिता को बताए या नहीं। आखिर उन्होंने कोई सपना नहीं बल्कि एक सच्ची घटना जो देखी थी।
 अरविन्द  मिश्र

अंतर्जाल पर प्रथम बार साहित्य शिल्पी द्वारा प्रकाशित