राम सेतु का यथार्थ
राम सेतु के मामले ने अब एक जनांदोलन का रूप ले लिया है और यह तो होना ही था .जब भी आम रूचि के मामलों पर जनता जनार्दन को विश्वास मे नही लिया जायेगा जनता ऐसे ही उठ खडी होगी .जनता को हर ऎसी योजनाओं के बारे मे बखूबी जानने का हक है जिसमे उसकी टेंट से करोड़ों रुपये खर्च होने वाले हों .राम सेतु का प्रसंग कुछ ऐसा ही है.
लेकिन अपने इस चिट्ठे पर इस मामले को उठाने की मेरी मंशा महज इतनी ही है कि हम इस मामले के वैज्ञानिक पहलू को ठीक से समझ लें .यह मुद्दा विज्ञान संचार का एक नायाब अवसर है और इसे मैं खोना नही चाहता .
मैं अपनी स्थापनायें सक्षेप मे प्रस्तुत कर रहां हूँ.
१-राम सेतु एक कुदरती रचना है जो रामेश्वर के धनुष्कोती जगह से लगभग ४० किमी एक समुद्रगत पगडंडी के रूप मे श्रीलंका तक पहूचता है.यह लायिम स्टोन का बना है -चुने के पत्थर और बालू का जमाव .
२.सोलहवीं शती तक इसका कुछ भाग कहीं कहीं पानी के ऊपर भी था और आम आवाजाही भी होती थी ,एक फेरी सेवा भी चलती रही है लेकिन आतंकवादी गतिविधियों के चलते यह बंद हो गयी.
३,चूंकि इसके चलते समुद्री जहाज़ों की आवाजाही बाधित रही है और पशिमी तट से जहाज श्रीलंका होकर क़रीब ६०० किमी का लंबा चक्कर काट कर बंगाल की खाडी पहुँचते हैं इसलिए कुछ लोगों को यह सद्बुद्धि आयी की क्यों न राम सेतु के एक हिस्से को तोड़ कर काफी गहरा कर इसे आवाजाही के लिए खोल दिया जाय .सब कुछ चुपके चुपके चलता रहा और २००५ आते आते अरबों की लागत की यह योजना आख़िर शुरू हो गयी .
४.आख़िर यह विवाद क्यों ? विवाद के कई पहलू हैं लेकिन सब के सब आम जन को विस्वास मे न लेने की वजह से हैं .राम सेतु के विनाश से बेशकीमती मूंगे की चट्टानें , मछलियों के साथ ही एक विशाल जैव संपदा का विनाश होगा .पश्चिमी और पूर्वी तट की जैव संपदा आपस मे जहाज़ों के बैलासट जल के जरिये मिलेगी और ऐसे जैवाक्रमण के दूरगामी परिणाम होंगे .कुछ प्रजातिआं विलुप्त भी हो सकती है.
मैं ख़ुद भी विज्ञान का का एक अदना सा सेवक हूँ और इमानदारी से कह रहां हूँ सरकार ने भली भांति इन पहलुओं की छान बीन नही कराई बस खाना पुरी ही हुयी है .
५-एक पहलू राम की अस्मिता पर सवाल का है .राम एक ऐतिहासिक तथ्य है या नही .यह कामन सेन्स और थोड़े तार्किक सोच की मांग करता है.अभी ताजातरीन जीनोग्रैफिक प्रमाणों ने यह प्रमाणित किया है की हजारों वर्ष पहले उत्तर की तरफ से एक यायावारी मानव जत्था दक्षिण तक पहुंचा था और वहाँ पहले से ही आबाद मूल वासिओं के नर सदस्यों का सफाया कर अपना बर्चस्व कायम किया .दरअसल यही वह लोक स्मृति है जो मिथकों के कई रूपों मे हमारे सामने आती रही है.
६-क्या राम एक यायावर के रूप मे उस समुद्री पगडंडी का पुनरोद्धार नही कर सकते .मिथकों के यथार्थ हमे शायद यही बताते हैं .हनुमान ने व्यापक सर्वे किया ,नल ने अपनी टीम को लेकर उस समुद्री पगडंडी का पुनर्निमाण /पुनरोद्धार किया .इसके पुन्र्खोज का सेहरा उन पर बांधना चाहिए .राम ने इस सेतु का नाम करण नल सेतु ही किया था .
७.आज हम एक विजेता पुरुषोत्तम राम के वंशज हैं ,किसकी हिम्मत है कि उनकी धरोहर मे हाथ लगाए -उस समय तक तो नही जब तक उनके वंशजों का वजूद कायम है .राम सेतु अब एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर भी है . .
Science fiction in India has lately emerged as a respectable literary genre. Please join me to have a panoramic view of Indian science fiction.
Wednesday, September 19, 2007
Sunday, September 16, 2007
क्या 'न्यूस्पीक' से आप परिचित हैं?
क्या 'न्यूस्पीक' से आप परिचित हैं?
पिछले दिनों मैंने आपका परिचय जार्ज आर्वेल और उनकी साहित्यिक
विरासत से कराया था .आर्वेलियन साहित्य का एक और पहलू काफी रोचक हैजो भाषा के एक नए रुप को दर्शाता है .आईये देखते हैं. ,
अभिव्यक्ति पर भी पहरा !
आर्वेलियन 1984 का एक और मामला ऐसा है जो साहित्य से जुड़ा है और मानवीय सरोकारों से भी उसका गहरा वास्ता रहा है। `1984´ में आर्वेल ने `न्यूस्पीक´ के नाम से एक ऐसी भाषा के विकास की झलक दिखाई है जो प्रचलित जनभाषा - अंग्रेजी को विकृत कर शासक-आक्रान्ता के पक्ष में एक सर्वथा नये भाषा-भाव को तरजीह देती है- यह एक तरह का भाषायी उत्पीड़न है जो विरोध के हर शब्दों-स्वरों को ही बदल डालने पर उद्यत है- यह प्रचलित शब्दों और वाक्याशों को अति संक्षिप्त रुप देने पर उतारु है- जैसे `1984´ के कल्पित विशाल `ओसीनिया´ राज्य के एक दलीय शासक की सरकारी भाषा `न्यू स्पीक´ के प्रचार में ऐसे सभी प्रचलित-पुराने शब्दों को संक्षिप्त कर उनका अर्थबोध बदल दिया जाता है, जिनसे पार्टी की नीति को खतरा है। न्यूस्पीक के अन्तर्गत `उत्पीड़न शिविरों´ को `ज्वाय कैम्प´,शासकीय प्रचार विभाग को, `द मिनिस्ट्री आफ ट्रुथ´, राशन विभाग को `मिनिस्ट्री आफ प्लेन्टी´, मात्र बच्चा पैदा करने की नीयत से किये गये भावना रहित रति सम्बन्ध को भी `गुड सेक्स´ जैसे शब्द दे दिये गये हैं। आर्वेल ने इस तरह के भाषा और भाव बोध की प्रेरणा आल्डुअस हक्सले के `द ब्रेव न्यू वल्र्ड´ से ग्रहण की है, जहाँ ``मृत्यु ही आनन्द´ है, सरीखी भावाभिव्यक्तिया¡ धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई हैं। भाषान्तरण का यह दौर हमारी वास्तविक दुनिया¡ में भी आ धमका है, आज `न्यूस्पीक डाट काम´ ऐसी साइट है जहा¡ आप ऐसे अनेक शब्द देख सकते हैं जो निहित स्वार्थों के चलते अनेक राजनीतिक शक्तियों द्वारा इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं और जो चाहे अनचाहे हमारे रोजमर्रा की बातों और विचारों में घुसपैठ कर रहे हैं। चन्द उदाहरण हैं- `होमोफोबिक´, `पीस कीपर्स´ `सेक्सुअल हरासमेन्ट´, आदि। कुछ बिल्कुल नये शब्द हैं- डोमेस्टिक इन्जीनियर (हाऊस वाइफ के लिए), घिनौने-बदसूरत व्यक्ति के लिए- ``विजुअली चैलेन्ज्ड´´ और विकलांग के लिए, `हैण्डीकैपैबल´ आदि।
क्या ऐसा कोई शब्द आपने भी गढा है?
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पिछले दिनों मैंने आपका परिचय जार्ज आर्वेल और उनकी साहित्यिक
विरासत से कराया था .आर्वेलियन साहित्य का एक और पहलू काफी रोचक हैजो भाषा के एक नए रुप को दर्शाता है .आईये देखते हैं. ,
अभिव्यक्ति पर भी पहरा !
आर्वेलियन 1984 का एक और मामला ऐसा है जो साहित्य से जुड़ा है और मानवीय सरोकारों से भी उसका गहरा वास्ता रहा है। `1984´ में आर्वेल ने `न्यूस्पीक´ के नाम से एक ऐसी भाषा के विकास की झलक दिखाई है जो प्रचलित जनभाषा - अंग्रेजी को विकृत कर शासक-आक्रान्ता के पक्ष में एक सर्वथा नये भाषा-भाव को तरजीह देती है- यह एक तरह का भाषायी उत्पीड़न है जो विरोध के हर शब्दों-स्वरों को ही बदल डालने पर उद्यत है- यह प्रचलित शब्दों और वाक्याशों को अति संक्षिप्त रुप देने पर उतारु है- जैसे `1984´ के कल्पित विशाल `ओसीनिया´ राज्य के एक दलीय शासक की सरकारी भाषा `न्यू स्पीक´ के प्रचार में ऐसे सभी प्रचलित-पुराने शब्दों को संक्षिप्त कर उनका अर्थबोध बदल दिया जाता है, जिनसे पार्टी की नीति को खतरा है। न्यूस्पीक के अन्तर्गत `उत्पीड़न शिविरों´ को `ज्वाय कैम्प´,शासकीय प्रचार विभाग को, `द मिनिस्ट्री आफ ट्रुथ´, राशन विभाग को `मिनिस्ट्री आफ प्लेन्टी´, मात्र बच्चा पैदा करने की नीयत से किये गये भावना रहित रति सम्बन्ध को भी `गुड सेक्स´ जैसे शब्द दे दिये गये हैं। आर्वेल ने इस तरह के भाषा और भाव बोध की प्रेरणा आल्डुअस हक्सले के `द ब्रेव न्यू वल्र्ड´ से ग्रहण की है, जहाँ ``मृत्यु ही आनन्द´ है, सरीखी भावाभिव्यक्तिया¡ धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई हैं। भाषान्तरण का यह दौर हमारी वास्तविक दुनिया¡ में भी आ धमका है, आज `न्यूस्पीक डाट काम´ ऐसी साइट है जहा¡ आप ऐसे अनेक शब्द देख सकते हैं जो निहित स्वार्थों के चलते अनेक राजनीतिक शक्तियों द्वारा इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं और जो चाहे अनचाहे हमारे रोजमर्रा की बातों और विचारों में घुसपैठ कर रहे हैं। चन्द उदाहरण हैं- `होमोफोबिक´, `पीस कीपर्स´ `सेक्सुअल हरासमेन्ट´, आदि। कुछ बिल्कुल नये शब्द हैं- डोमेस्टिक इन्जीनियर (हाऊस वाइफ के लिए), घिनौने-बदसूरत व्यक्ति के लिए- ``विजुअली चैलेन्ज्ड´´ और विकलांग के लिए, `हैण्डीकैपैबल´ आदि।
क्या ऐसा कोई शब्द आपने भी गढा है?
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Monday, September 10, 2007
जार्ज आर्वेल और उनकी साहित्यिक विरासत
जार्ज ओर्वेल की मशहूर कृति ,१९८४ शायद आप मे से किसी ने जरूर पढी होगी . अगर ना भी पढी हो तो कोई बातनही आज मैं आपको इस महान ब्रितानी उपन्यासकार के जीवन और कृतित्व के बारे मे बताने जा रहा हूँ जिसनेसाहित्य के वैश्विक पटल पर कभी तहलका मचा दिया था , खासतौर पर विज्ञान कथा साहित्य दुनियां मे.
जार्ज आर्वेल और उनकी
साहित्यिक विरासत
जार्ज आर्वेल (1903-1950) एक वह छद्म नाम्नी शfख्सयत़ हैं, जिन्होंने अपनी मात्र दो औपन्यासिक कृतियों के जरिये विज्ञान कथाकारों के बीच `बिग ब्रदर´ का दर्जा हासिल कर लिया। `एनिमल फार्म´ और `1984´ उपन्यासों के रचयिता इरिक आर्थर ब्लेयर ने अपनी इन दोनों कृतियों के सहारे `जार्ज आर्वेल´ के छदम् नाम से रातो रात शोहरत के शिखर को छू लिया।
जीवन की झलकिया¡ :
भारत में ही 1903 में जन्में ब्लयेर इंडियन सिविल सेवा में कार्यरत एक अंग्रेज की सन्तान थे और खुद भी ब्रितानी हुकूमत के एक लम्बे अरसे तक मुलाजिम रहे। वे ब्रितानी हुकूमत के अधीन बर्मा और इटन शहर में कार्यरत रहे। उनकी माली हालत सरकारी सेवा के दौरान अच्छी नहीं रही। उन्होंने एक रचनाकार-लेखक के रुप में भाग्य आजमाना चाहा और संयोग से बात बन गई। अपनी खराब माली हालत के चलते वे अपने सेवाकाल में कभी भी भद्र/अभिजात्य अंग्रेज वर्ग की बराबरी में नहीं आ सके, जबकि ऐसे जीवन को वे तरस रहे थे। अभिजात्य अंग्रेजों के बीच अपनी हालत को लेकर वे `हीनता ग्रfन्थ´ के शिकार भी हो गये थे और उनके (उच्च अंग्रेज वर्ग के) प्रति उनमें एक तरह का विद्रोह पनप रहा था। अमेरिका में तो `हिप्पी´ संस्कृति की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी, किन्तु इस ब्रितानी रचनाकार ने 1920 के दशक से ही हिfप्पयों जैसा रहन सहन और वेष भूषा अपना ली थी। उन्हें लन्दन और पेरिस की झोपड़ पटि्टयों में रहने का चस्का लगा जहा¡ की मानवेतर स्थितियों से उन्हें अपनी पुस्तकों की पृष्ठभूमि सामग्री मिलती गयी। वे मूलत: समाजवादी विचार धारा के पोषक थे किन्तु स्पेनी साम्यवादियों, अराजक विचारकों के आगे उन्हें झुकना पड़ा। स्पेन के संगठित साम्यवादियों से जान का खतरा भा¡पते हुए उन्होंने आखिरकार स्पेन को अलविदा कह दिया। साम्यवादियों के कथित दु:श्चक्रों से ऊब कर उन्होंने उनके विरुद्ध एक आजीवन रचनात्मक विद्रोह छेड़ा, जिसकी सुखद परिणति विज्ञान कथा साहित्य के ेमशहूर धरोहरों में हुई- `एनिमल फार्म´ और `1884´ ! अपनी इन दोनों कालजयी कृतियों के माध्यम से ब्लेयर ने शब्दों के बलबूते साम्यवादियों से वह लड़ाई जीतनी चाही, जिसे दरअसल वे व्यवहार में हार चुके थे। यहा¡ तक कि उनकी अपने ब्रितानी लेबर पार्टी से भी नहीं पटी और अपने खास समाजवादी विचारों के कारण उन्हें सेना में भरती से मना कर दिया गया।
एनिमल फार्म :
कम्युनिस्टों के प्रति उनके मन में विद्रोह की चिन्गारी सुलगती रही जो स्टालिन के साम्यवाद के खिलाफ शोला बनकर भड़क उठी। नतीजतन, उस समय जबकि ब्रितानी सेना रुसी सेना के सहयोग से नाजियों के विरुद्ध जूझ रही थी आर्वेल ने `एनिमल फार्म´ की रचना की जो रुसी क्रान्ति पर एक जोरदार व्यंग था। इस उपन्यास का एक जुमला बहुत प्रसिद्ध हुआ, ``आल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम एनिमल्स आर मोर इक्वल दैन अदर्स´´। उपन्यास में एक दरबे में रहने वाले पशुओं का अपने मानव स्वामियों के विरुद्ध किये गये विद्रोह का कटाक्षपूर्ण रुपक चित्रित हुआ है।
ब्लेयर ने `एनिमल फार्म´ की रचना 1944 में पूरी कर ली थी। किन्तु ब्रिटेन पर सोवियत रुस के प्रभाव के चलते उन्हें इसका प्रकाशक ढूढ़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। बहरहाल द्वितीय, विश्वयुद्ध के खत्म होते ही `एनिमल फार्म´ का प्रकाशन हो गया और इस उपन्यास ने ब्लेयर के लेखकीय कैरियर को सहसा ही उछाल दिया। इस उपन्यास से अर्जित धन और सम्मान ने उन्हें अपनी अगली विश्व विश्रुत कृति, `1984´ के लिए प्रेरित किया।
बहुचर्चित कृति, ``उन्नीस सौ चौरासी´´ :
`1984´ का प्रकाशन 1949 में हुआ, जिसमें स्टालिन जैसे तानाशाह के अधीन शासित 1930 के दौर के रुसी साम्राज्य के विश्वव्यापी फैलाव की आशंकाये व्यक्त हुई थीं। यह साम्यवादी और विरोधी राजनीतिक विचारों के द्वन्द्व को अभिव्यक्त करती एक अद्भुत कृति मानी गयी, जिसमें बर्बर नाजियों और यातनागृहों के उल्लेख के साथ ही हतभाग्य यहूदियों की दीन दशा भी वfर्णत हुई है।
यह विशुद्ध रुप से एक स्टालिन (वाद) विरोधी-कृति मानी गयी - यद्यपि कालान्तर में इसे किसी भी तानाशाही प्रवृत्ति या नागरिकों के निजी जीवन में बढ़ते सरकारी हस्तक्षेपों के विरुद्ध आवाज उठाने वाली एक प्रभावशाली कृति के रुप में मान्यता मिलने लगी। `बिग्र ब्रदर इज वाचिंग यू´ (देखो, खूसट दादा/बुड्ढा देख रहा है) इसी उपन्यास से निकला हुआ जुमला है जिसका इस्तेमाल प्राय: निजी जीवन में किसी के हस्तक्षेप-ताक झांक के प्रयासों के समय किया जाता है। यह वाक्य-जुमला निजता में हस्तक्षेप के विरुद्ध कुछ न कर पाने की असहायता को भी इंगित करता है। एक तरह से `1984´ का `बिग ब्रदर´ महज एक राजनीतिक बड़बोलेपन को ही रुपायित नहीं करता बल्कि उपन्यास में वfर्णत विज्ञान, श्रमिक सभी कुछ बड़े ही हैं, जिनसे पार पाना सम्भव नहीं है। क्या उपन्यास में वfर्णत `1984 सरीखा ही होगा वास्तविक 1984? लोगों के मन प्राय: यह प्रश्न कौंधा करता।
1984 आया और चला गया मगर `आर्वेलियन´ `1984´ की दहशतनाक, हौलनाक तस्वीरें पूरी तरह से हकीकत में तब्दील नहीं हुईं। दुनिया¡ ने तब राहत की सा¡स ली थी, जिसमें इन पंक्तियों का लेखक भी था। मगर क्या 1984 की सारी सम्भावनायें एक सिरे से खारिज हो चुकी है? शायद नहीं। हाँ , उपन्यास ने एक विज्ञान कथात्मक साहित्य के रुप में नि:सन्देह अपार ख्याति अर्जित की, यद्यपि ब्लेयर स्वयं गौरव के इन क्षणों के भागीदार नहीं बन सके। वे लन्दन के एक टी0बी0 अस्पताल में इसी रोग से मात्र 47 वर्ष के अल्पायु में ही, जनवरी 1950 में चल बसे यानी `1994´ के प्रकाशन के बस चन्द महीनों के बाद। कहते हैं कि ब्लेयर की अवश्यम्भावी मृत्यु के पूर्वाभास ने भी 1984 के कथानक को और तिक्त बना दिया था।
1984 की कथावस्तु :
आइये `1984´ के विज्ञान कथा (वस्तु) का भी एक जायजा लिया जाय। आर्वेल एक ऐसे `ग्रेट ब्रिटेन´ की कल्पना करते नज़र आते हैं जहा¡ रुसी क्रान्ति सरीखा परिवेश है, जिसमें स्टालिन जैसे एक `बिग ब्रदर´ की तूती बोलती है- वह जो चाहता है, करता है एक निरंकुश, निष्ठुर आक्रान्ता की तरह। उपन्यास के लिखे जाने तक चू¡कि टेलीविजन का आगाज हो चुका था अत: इस कृति में लन्दन सरीखे शहर में जहा¡ सारी व्यवस्थायें फेल हो रही हैं, टी0वी0 बेखाख्ता चालू है स्विच हर पल, हर घण्टा वह आफ´ नहीं हो सकता क्योंकि इसी के सहारे तरह-तरह के सरकारी निर्देश हर क्षण प्रसारित हो रहे हैं। यह एक तरफा टी0वी0 संचार नहीं बल्कि दुतरफा संवाद वाला टी0वी0 है, जिसे देखने वाले भी कहीं से (बिग ब्रदर!) देखे जा रहे होते हैं। हर वक्त नागरिकों के निगरानी की सूझ, `1984´ की विशिष्ट दूर दृष्टि है। भले ही कोई बाथरुम में हो या निद्रा मग्न हो उसकी निगरानी जारी रहती है। अर्थात `होशियार! खूसट बुड्ढा देख रहा है´। हर कोई एक दूसरे को वाच कर रहा है- किसी का किसी पर भरोसा नहीं है, सभी सन्देह के दायरे में हैं।
विज्ञान कथा समीक्षकों की दृष्टि में `1984´ को आश्चर्यजनक रुप से एक `लो ग्रेड´ `साइंस फिक्शन´ का दर्जा मिला है, जबकि मुख्य धारा के साहित्य में इसकी सर्वत्र चर्चा हुई है, समादर हुआ है। आइज़क आसीमोव, जहाँ इसे एक `खराब साइंस फिक्शन´ का नमूना मानते हैं, अनेक अमेरिकी-ब्रितानी साहित्यकार इसे एक आँखें खोलने´ वाली कृति करार देते हैं। कहीं, आसिमोव सरीखा मसीहा विज्ञान कथाकार भी आर्वेल के `बिग ब्रदर´ वाली इमेज से खौफ तो नहीं खा गया- कहीं वे आशंकित तो नहीं हो उठे थे कि हो न हो आर्वेल अपनी एक कृति से ही कहीं `विज्ञान कथाकारों´ के `बिग ब्रदर´ न बन जा¡य। इतिहास साक्षी है वे `बिग ब्रदर बन ही बैठे।
1984 की ओर बढ़ रही है दुनिया¡!
एक कहावत है `जो बीत गई सो बात `गई´ मगर शायद आर्वेल की मशहूर कृति, 1984 के मामले में यह लागू नहीं होती। भले ही, 1984 तक `आर्वेल के दु:स्वप्न पूरी तरह से साकार नहीं हुए थे और जिसे देखने के लिए सौभाग्य से वे जिन्दा भी नही थे( `1984´ की कल्पित दुनिया¡ के वे कतिपय दहशतनाक पहलू जल्दी ही साकार होने लग गये थे जो हमारी अभिव्यक्ति और निजता की आजादी से सीधे जुड़े हुए हैं।
जार्ज आर्वेल और उनकी
साहित्यिक विरासत
जार्ज आर्वेल (1903-1950) एक वह छद्म नाम्नी शfख्सयत़ हैं, जिन्होंने अपनी मात्र दो औपन्यासिक कृतियों के जरिये विज्ञान कथाकारों के बीच `बिग ब्रदर´ का दर्जा हासिल कर लिया। `एनिमल फार्म´ और `1984´ उपन्यासों के रचयिता इरिक आर्थर ब्लेयर ने अपनी इन दोनों कृतियों के सहारे `जार्ज आर्वेल´ के छदम् नाम से रातो रात शोहरत के शिखर को छू लिया।
जीवन की झलकिया¡ :
भारत में ही 1903 में जन्में ब्लयेर इंडियन सिविल सेवा में कार्यरत एक अंग्रेज की सन्तान थे और खुद भी ब्रितानी हुकूमत के एक लम्बे अरसे तक मुलाजिम रहे। वे ब्रितानी हुकूमत के अधीन बर्मा और इटन शहर में कार्यरत रहे। उनकी माली हालत सरकारी सेवा के दौरान अच्छी नहीं रही। उन्होंने एक रचनाकार-लेखक के रुप में भाग्य आजमाना चाहा और संयोग से बात बन गई। अपनी खराब माली हालत के चलते वे अपने सेवाकाल में कभी भी भद्र/अभिजात्य अंग्रेज वर्ग की बराबरी में नहीं आ सके, जबकि ऐसे जीवन को वे तरस रहे थे। अभिजात्य अंग्रेजों के बीच अपनी हालत को लेकर वे `हीनता ग्रfन्थ´ के शिकार भी हो गये थे और उनके (उच्च अंग्रेज वर्ग के) प्रति उनमें एक तरह का विद्रोह पनप रहा था। अमेरिका में तो `हिप्पी´ संस्कृति की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी, किन्तु इस ब्रितानी रचनाकार ने 1920 के दशक से ही हिfप्पयों जैसा रहन सहन और वेष भूषा अपना ली थी। उन्हें लन्दन और पेरिस की झोपड़ पटि्टयों में रहने का चस्का लगा जहा¡ की मानवेतर स्थितियों से उन्हें अपनी पुस्तकों की पृष्ठभूमि सामग्री मिलती गयी। वे मूलत: समाजवादी विचार धारा के पोषक थे किन्तु स्पेनी साम्यवादियों, अराजक विचारकों के आगे उन्हें झुकना पड़ा। स्पेन के संगठित साम्यवादियों से जान का खतरा भा¡पते हुए उन्होंने आखिरकार स्पेन को अलविदा कह दिया। साम्यवादियों के कथित दु:श्चक्रों से ऊब कर उन्होंने उनके विरुद्ध एक आजीवन रचनात्मक विद्रोह छेड़ा, जिसकी सुखद परिणति विज्ञान कथा साहित्य के ेमशहूर धरोहरों में हुई- `एनिमल फार्म´ और `1884´ ! अपनी इन दोनों कालजयी कृतियों के माध्यम से ब्लेयर ने शब्दों के बलबूते साम्यवादियों से वह लड़ाई जीतनी चाही, जिसे दरअसल वे व्यवहार में हार चुके थे। यहा¡ तक कि उनकी अपने ब्रितानी लेबर पार्टी से भी नहीं पटी और अपने खास समाजवादी विचारों के कारण उन्हें सेना में भरती से मना कर दिया गया।
एनिमल फार्म :
कम्युनिस्टों के प्रति उनके मन में विद्रोह की चिन्गारी सुलगती रही जो स्टालिन के साम्यवाद के खिलाफ शोला बनकर भड़क उठी। नतीजतन, उस समय जबकि ब्रितानी सेना रुसी सेना के सहयोग से नाजियों के विरुद्ध जूझ रही थी आर्वेल ने `एनिमल फार्म´ की रचना की जो रुसी क्रान्ति पर एक जोरदार व्यंग था। इस उपन्यास का एक जुमला बहुत प्रसिद्ध हुआ, ``आल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम एनिमल्स आर मोर इक्वल दैन अदर्स´´। उपन्यास में एक दरबे में रहने वाले पशुओं का अपने मानव स्वामियों के विरुद्ध किये गये विद्रोह का कटाक्षपूर्ण रुपक चित्रित हुआ है।
ब्लेयर ने `एनिमल फार्म´ की रचना 1944 में पूरी कर ली थी। किन्तु ब्रिटेन पर सोवियत रुस के प्रभाव के चलते उन्हें इसका प्रकाशक ढूढ़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। बहरहाल द्वितीय, विश्वयुद्ध के खत्म होते ही `एनिमल फार्म´ का प्रकाशन हो गया और इस उपन्यास ने ब्लेयर के लेखकीय कैरियर को सहसा ही उछाल दिया। इस उपन्यास से अर्जित धन और सम्मान ने उन्हें अपनी अगली विश्व विश्रुत कृति, `1984´ के लिए प्रेरित किया।
बहुचर्चित कृति, ``उन्नीस सौ चौरासी´´ :
`1984´ का प्रकाशन 1949 में हुआ, जिसमें स्टालिन जैसे तानाशाह के अधीन शासित 1930 के दौर के रुसी साम्राज्य के विश्वव्यापी फैलाव की आशंकाये व्यक्त हुई थीं। यह साम्यवादी और विरोधी राजनीतिक विचारों के द्वन्द्व को अभिव्यक्त करती एक अद्भुत कृति मानी गयी, जिसमें बर्बर नाजियों और यातनागृहों के उल्लेख के साथ ही हतभाग्य यहूदियों की दीन दशा भी वfर्णत हुई है।
यह विशुद्ध रुप से एक स्टालिन (वाद) विरोधी-कृति मानी गयी - यद्यपि कालान्तर में इसे किसी भी तानाशाही प्रवृत्ति या नागरिकों के निजी जीवन में बढ़ते सरकारी हस्तक्षेपों के विरुद्ध आवाज उठाने वाली एक प्रभावशाली कृति के रुप में मान्यता मिलने लगी। `बिग्र ब्रदर इज वाचिंग यू´ (देखो, खूसट दादा/बुड्ढा देख रहा है) इसी उपन्यास से निकला हुआ जुमला है जिसका इस्तेमाल प्राय: निजी जीवन में किसी के हस्तक्षेप-ताक झांक के प्रयासों के समय किया जाता है। यह वाक्य-जुमला निजता में हस्तक्षेप के विरुद्ध कुछ न कर पाने की असहायता को भी इंगित करता है। एक तरह से `1984´ का `बिग ब्रदर´ महज एक राजनीतिक बड़बोलेपन को ही रुपायित नहीं करता बल्कि उपन्यास में वfर्णत विज्ञान, श्रमिक सभी कुछ बड़े ही हैं, जिनसे पार पाना सम्भव नहीं है। क्या उपन्यास में वfर्णत `1984 सरीखा ही होगा वास्तविक 1984? लोगों के मन प्राय: यह प्रश्न कौंधा करता।
1984 आया और चला गया मगर `आर्वेलियन´ `1984´ की दहशतनाक, हौलनाक तस्वीरें पूरी तरह से हकीकत में तब्दील नहीं हुईं। दुनिया¡ ने तब राहत की सा¡स ली थी, जिसमें इन पंक्तियों का लेखक भी था। मगर क्या 1984 की सारी सम्भावनायें एक सिरे से खारिज हो चुकी है? शायद नहीं। हाँ , उपन्यास ने एक विज्ञान कथात्मक साहित्य के रुप में नि:सन्देह अपार ख्याति अर्जित की, यद्यपि ब्लेयर स्वयं गौरव के इन क्षणों के भागीदार नहीं बन सके। वे लन्दन के एक टी0बी0 अस्पताल में इसी रोग से मात्र 47 वर्ष के अल्पायु में ही, जनवरी 1950 में चल बसे यानी `1994´ के प्रकाशन के बस चन्द महीनों के बाद। कहते हैं कि ब्लेयर की अवश्यम्भावी मृत्यु के पूर्वाभास ने भी 1984 के कथानक को और तिक्त बना दिया था।
1984 की कथावस्तु :
आइये `1984´ के विज्ञान कथा (वस्तु) का भी एक जायजा लिया जाय। आर्वेल एक ऐसे `ग्रेट ब्रिटेन´ की कल्पना करते नज़र आते हैं जहा¡ रुसी क्रान्ति सरीखा परिवेश है, जिसमें स्टालिन जैसे एक `बिग ब्रदर´ की तूती बोलती है- वह जो चाहता है, करता है एक निरंकुश, निष्ठुर आक्रान्ता की तरह। उपन्यास के लिखे जाने तक चू¡कि टेलीविजन का आगाज हो चुका था अत: इस कृति में लन्दन सरीखे शहर में जहा¡ सारी व्यवस्थायें फेल हो रही हैं, टी0वी0 बेखाख्ता चालू है स्विच हर पल, हर घण्टा वह आफ´ नहीं हो सकता क्योंकि इसी के सहारे तरह-तरह के सरकारी निर्देश हर क्षण प्रसारित हो रहे हैं। यह एक तरफा टी0वी0 संचार नहीं बल्कि दुतरफा संवाद वाला टी0वी0 है, जिसे देखने वाले भी कहीं से (बिग ब्रदर!) देखे जा रहे होते हैं। हर वक्त नागरिकों के निगरानी की सूझ, `1984´ की विशिष्ट दूर दृष्टि है। भले ही कोई बाथरुम में हो या निद्रा मग्न हो उसकी निगरानी जारी रहती है। अर्थात `होशियार! खूसट बुड्ढा देख रहा है´। हर कोई एक दूसरे को वाच कर रहा है- किसी का किसी पर भरोसा नहीं है, सभी सन्देह के दायरे में हैं।
विज्ञान कथा समीक्षकों की दृष्टि में `1984´ को आश्चर्यजनक रुप से एक `लो ग्रेड´ `साइंस फिक्शन´ का दर्जा मिला है, जबकि मुख्य धारा के साहित्य में इसकी सर्वत्र चर्चा हुई है, समादर हुआ है। आइज़क आसीमोव, जहाँ इसे एक `खराब साइंस फिक्शन´ का नमूना मानते हैं, अनेक अमेरिकी-ब्रितानी साहित्यकार इसे एक आँखें खोलने´ वाली कृति करार देते हैं। कहीं, आसिमोव सरीखा मसीहा विज्ञान कथाकार भी आर्वेल के `बिग ब्रदर´ वाली इमेज से खौफ तो नहीं खा गया- कहीं वे आशंकित तो नहीं हो उठे थे कि हो न हो आर्वेल अपनी एक कृति से ही कहीं `विज्ञान कथाकारों´ के `बिग ब्रदर´ न बन जा¡य। इतिहास साक्षी है वे `बिग ब्रदर बन ही बैठे।
1984 की ओर बढ़ रही है दुनिया¡!
एक कहावत है `जो बीत गई सो बात `गई´ मगर शायद आर्वेल की मशहूर कृति, 1984 के मामले में यह लागू नहीं होती। भले ही, 1984 तक `आर्वेल के दु:स्वप्न पूरी तरह से साकार नहीं हुए थे और जिसे देखने के लिए सौभाग्य से वे जिन्दा भी नही थे( `1984´ की कल्पित दुनिया¡ के वे कतिपय दहशतनाक पहलू जल्दी ही साकार होने लग गये थे जो हमारी अभिव्यक्ति और निजता की आजादी से सीधे जुड़े हुए हैं।
Friday, September 7, 2007
ना बाबा ना बाबा पिछवाडे बुड्ढा खांसता !
अब कथित बुड्ढा खांस ही नही रहा बल्कि वह आपके निजी जीवन मे तांक झांक पर भी उतारू हो गया है । आशय यह कि आर्वेलियन संसार अब वजूद मे आ रहा है , जिसकी कल्पना १९३९ मे ही इस महान उपन्यासकार ने कर ली थी . उस कालजयी कृति का नाम था ,१९८४। इस वैज्ञानिक उपन्यास की चर्चा मैं अपने अगले पत्र मे करुंगा ,फिलहाल आप यह रिपोर्ट पढ़ें ।
खूसट बुड्ढा झांक रहा है !
अभी पिछले माह (15 अगस्त,2007) `टाइम्स आफ इण्डिया´ के लखनऊ संस्करण में यह खबर सुfर्खयों में छपीथी कि चीन अपने नागरिकों के गतिविधियों की निगरानी की एक कम्प्यूटर जुगत को बड़े पैमाने पर आजमा रहाहै। (चाइना प्लान्स टू ट्रैक सिटिजेन्स)। खबर में इस बात का खुलासा था कि 20,000 सर्विलांस कैमरे चीन की गलियों (शुक्र है, चीन की दीवार अभी बची है) में लगाये जा रहे हैं, जिसमें नागरिक गतिविधियों की पल-पल कीजानकारी एक अमेरिकी कम्पनी के आधुनिक कम्प्यूटर साफ्टवेयर के जरिये रखी जायेगी, जो संदिग्ध चेहरों कीपहचान भी करेगा और असामान्य घटनाओं पर भी पैनी निगाह रखेगा। दक्षिण चीन से शुरु हुआ यह याfन्त्रकअभियान शीघ्र ही शेन्झेन शहर जिसकी आबादी एक करोड़ से भी अधिक है को अपनी गिरफ्त में ले लेगा। दुतरफासंचार के लिए यहाँ के नागरिकों को शक्तिशाली कम्प्यूटर चिप युक्त `रेसीडेन्सी´ कार्ड वितरित किया जायेगा, जिसेहरवक्त `आन´ रखना होगा।
इस स्मार्ट कार्ड में नागरिक के नाम पते के साथ ही उनके व्यवसाय- धन्धे की सारी दास्तान, शैक्षिक पृष्ठ- भूमि, धर्म, भौगोलिकता, पुलिस रिकार्ड, मेडिकल बीमे की स्थिति, किरायेदार होने पर मकान मालिक के निवास काफोन नम्बर आदि जानकारी अंकित होगी। अर्थात बच के कहॉ जाओगे बच्चू, बिग ब्रदर इज वाचिंग यू´ की तर्जपर सारा तामझाम किया जा रहा है। इस कवायद ने बरबस ही, जार्ज आर्वेल के `बिग ब्रदर´ की याद दिला दी हैऔर इसे सच कहेंगे या संयोग, आर्वेल ने ऐसी व्यवस्था को एक साम्यवादी देश में ही घटने का दु:स्वप्न देखा था। राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में बने रहने की अपनी नीयत के चलतेयह सब कर रही है, जिसमें इन दिनों धनाढ्य हो रही चीनी जन शक्ति के गली-गली में उभर रहे व्यवस्था विरोध केस्वरों को कठोरता से दबाया जा सके (आर्वेल का भविष्य दर्शन भी तो बिल्कुल यही है!) चीन की `पब्लिकसेक्योरिटी टेक्नोलॉजी कम्पनी´ जो यह प्रौद्योगिकी मुहैया करा रही है के मुखिया मिशेल लिन की मानें तो यहरेजिडेन्ट कार्ड सभी चीनवासियों के लिए अनिवार्य कर दिया जायेगा और बिना इसके किसी को भी चीन में निवासकी अनुमति नहीं होगी। चीन में इस प्रौद्योगिक मुहिम के विरोध में मानव स्वतन्त्रता के पैराकारों के स्वर बुलन्द होरहे हैं, जिसमें न्यूयार्क के' ह्यूमन राइट्स वाच´ की पदाधिकारी दीनाह पोकम्पनर की आवाज काफी बुलन्द है।
अब कथित बुड्ढा खांस ही नही रहा बल्कि वह आपके निजी जीवन मे तांक झांक पर भी उतारू हो गया है । आशय यह कि आर्वेलियन संसार अब वजूद मे आ रहा है , जिसकी कल्पना १९३९ मे ही इस महान उपन्यासकार ने कर ली थी . उस कालजयी कृति का नाम था ,१९८४। इस वैज्ञानिक उपन्यास की चर्चा मैं अपने अगले पत्र मे करुंगा ,फिलहाल आप यह रिपोर्ट पढ़ें ।
खूसट बुड्ढा झांक रहा है !
अभी पिछले माह (15 अगस्त,2007) `टाइम्स आफ इण्डिया´ के लखनऊ संस्करण में यह खबर सुfर्खयों में छपीथी कि चीन अपने नागरिकों के गतिविधियों की निगरानी की एक कम्प्यूटर जुगत को बड़े पैमाने पर आजमा रहाहै। (चाइना प्लान्स टू ट्रैक सिटिजेन्स)। खबर में इस बात का खुलासा था कि 20,000 सर्विलांस कैमरे चीन की गलियों (शुक्र है, चीन की दीवार अभी बची है) में लगाये जा रहे हैं, जिसमें नागरिक गतिविधियों की पल-पल कीजानकारी एक अमेरिकी कम्पनी के आधुनिक कम्प्यूटर साफ्टवेयर के जरिये रखी जायेगी, जो संदिग्ध चेहरों कीपहचान भी करेगा और असामान्य घटनाओं पर भी पैनी निगाह रखेगा। दक्षिण चीन से शुरु हुआ यह याfन्त्रकअभियान शीघ्र ही शेन्झेन शहर जिसकी आबादी एक करोड़ से भी अधिक है को अपनी गिरफ्त में ले लेगा। दुतरफासंचार के लिए यहाँ के नागरिकों को शक्तिशाली कम्प्यूटर चिप युक्त `रेसीडेन्सी´ कार्ड वितरित किया जायेगा, जिसेहरवक्त `आन´ रखना होगा।
इस स्मार्ट कार्ड में नागरिक के नाम पते के साथ ही उनके व्यवसाय- धन्धे की सारी दास्तान, शैक्षिक पृष्ठ- भूमि, धर्म, भौगोलिकता, पुलिस रिकार्ड, मेडिकल बीमे की स्थिति, किरायेदार होने पर मकान मालिक के निवास काफोन नम्बर आदि जानकारी अंकित होगी। अर्थात बच के कहॉ जाओगे बच्चू, बिग ब्रदर इज वाचिंग यू´ की तर्जपर सारा तामझाम किया जा रहा है। इस कवायद ने बरबस ही, जार्ज आर्वेल के `बिग ब्रदर´ की याद दिला दी हैऔर इसे सच कहेंगे या संयोग, आर्वेल ने ऐसी व्यवस्था को एक साम्यवादी देश में ही घटने का दु:स्वप्न देखा था। राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में बने रहने की अपनी नीयत के चलतेयह सब कर रही है, जिसमें इन दिनों धनाढ्य हो रही चीनी जन शक्ति के गली-गली में उभर रहे व्यवस्था विरोध केस्वरों को कठोरता से दबाया जा सके (आर्वेल का भविष्य दर्शन भी तो बिल्कुल यही है!) चीन की `पब्लिकसेक्योरिटी टेक्नोलॉजी कम्पनी´ जो यह प्रौद्योगिकी मुहैया करा रही है के मुखिया मिशेल लिन की मानें तो यहरेजिडेन्ट कार्ड सभी चीनवासियों के लिए अनिवार्य कर दिया जायेगा और बिना इसके किसी को भी चीन में निवासकी अनुमति नहीं होगी। चीन में इस प्रौद्योगिक मुहिम के विरोध में मानव स्वतन्त्रता के पैराकारों के स्वर बुलन्द होरहे हैं, जिसमें न्यूयार्क के' ह्यूमन राइट्स वाच´ की पदाधिकारी दीनाह पोकम्पनर की आवाज काफी बुलन्द है।
Wednesday, September 5, 2007
खून्स्ट बुड्धा देख रहा है!
इन दिनो चीन के कई शहरों मे नागरिकों पर हर वक़्त नज़र रखने के लिए एक अमेरीकी कंपनी ने कंप्यूटर प्रोग्रॅम्स,साफ्टवेयर मुहैया कराएँ हैं.मुझे जार्ज आरवेल के मशहूर नॉवेल ,1984 की याद आ गयी जिसमे एक ऐसी व्यवस्था का जिक्र है और एक प्रसिद्ध जुमला भी उन्ही क़ी दें है-बिग ब्रदर ईज़ वॅचिंग यू-मैं जार्ज आरवेल और उनकी इस मशहूर कृति पर अपने विचार साथी चित्ठिकारों से साझा करने को उतावला हूं -मगर एक दिक्कत दरपेश है.बिग ब्रदर ईज़ वॅचिंग यू का सटीक अनुवाद/ भावानुवाद क्या होगा?
मुझे अपने बचपन का एक फ़िल्मी गाना याद आ गया -ना बाबा ना बाबा पिच्छवारे बुड्धा खांसता .यानी
निजी ज़िंदगी मे दख़ल.यही भाव तो ऑर्वेल के जुमले का भी है,फिर भी मुझे संकोच है . ईश जुमले का कोई अच्छा सा हिंदी रूप कोई चित्ठिकार भाई मुझे सुझा सकतें है ताक़ि मैं अपनी चिट्ठी पूरी कर आपकी सेवा मे पेश कर संकू .
मुझे अपने बचपन का एक फ़िल्मी गाना याद आ गया -ना बाबा ना बाबा पिच्छवारे बुड्धा खांसता .यानी
निजी ज़िंदगी मे दख़ल.यही भाव तो ऑर्वेल के जुमले का भी है,फिर भी मुझे संकोच है . ईश जुमले का कोई अच्छा सा हिंदी रूप कोई चित्ठिकार भाई मुझे सुझा सकतें है ताक़ि मैं अपनी चिट्ठी पूरी कर आपकी सेवा मे पेश कर संकू .
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