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Saturday, February 16, 2008

आईये जाने क्या है विज्ञान कथा -समापन किश्त !

आईये जाने क्या है विज्ञान कथा पर मेरी यह अन्तिम विनम्र प्रस्तुति है .अभी फिलहाल इतना ही ..हो सकता है मेरा यह टिटिट् प्रयास कुछ लोगों मे इस उपेक्षित हिन्दी साहित्य की विधा के प्रति वात्सल्य जगा सके ........
कुछ समीक्षकों का मानना है कि फिक्शन जो लातिनी मूल का शब्द है और जिसका अर्थ है ``आविष्कार करना´´ विचारों (आईडिया) से सम्बन्धित है जबकि ग्रीक मूल के शब्द `फैन्टेसी´ जिसका अर्थ है कल्पना करना, छाया चित्रण यानी `इमेजेज´ का भाव लिये हुए है। आशय यह कि साइंस फिक्शन´ विचार प्रधान कथायें हैं तो वहीं `साइंस फंतासी´ दृश्य प्रधान प्रस्तुति है। इस अर्थ में भी साइंस फिक्शन-फंतासी के विभेद को समझना आसान है। गौरतलब है मिथक भी दृश्य प्रधानता लिये होते हैं। अर्थात मिथकों और विज्ञान फंतासी में काफी हद तक समानता सी है।
विज्ञान कथायें बिना इस `लेबेल´ के भी मुख्यधारा के साहित्य में यदा-कदा दिखती रही हैं- पहले के अनेक कथाकार `विज्ञान कथा´ के `नामकरण´ से ही अपरिचित थे- यह तो कालान्तर में इस विधा की विशिष्ट पहचान को बनाये रखने के लिए `विधागत विज्ञान कथा´ (जानरे एसण्एफण्) का एक अलग वर्गीकरण ही बना दिया गया है। पर मेरी शैली की `फ्रेन्केन्स्टीन´ (1818) आल्डुअस हक्सले की `द ब्रेव न्यू वल्र्ड´ (1938) जार्ज आर्वेल का `एनिमल फार्म´ और '1984'(1960) जैसी अमर कृतियाँ मुख्य धारा के ही साहित्य के रुप में चर्चित हुईं। आज भी विज्ञान कथाओं को मुख्यधारा के साहित्य के रुप में प्रचारित प्रसारित करने की हिमायत हो रही है। हमारे यहाँ राहुल सांकृत्यायन की `बाईसवीं सदी´ (1924), आचार्य चतुरसेन शास्त्री का `खग्रास´ (1960), डॉ0 सम्पूर्णानन्द का `धरती से सप्तिर्षमण्डल´ (1970) मुख्यधारा की बेहतरीन विज्ञान कथायें रही हैं।डा0 राकेश गुप्त (ग्रन्थायन, अलीगढ़) ने धर्मयुग में प्रकाशित इस नाचीज की एक आरिम्भक वैज्ञानिक कहानी-'एक ऑर क्रौंचवध '(1989) को नवें दशक की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में स्थान दिया है .
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Friday, February 15, 2008

विज्ञान कथा ऑर मिथक मे फर्क !


क्या सभी कथा-कहानियों जिनमें मौजूदा समाज से अलग-थलग परिवेश जुगतों, पात्रों का चित्रण होता है को `विज्ञान कथा´ का दर्जा देना उचित है? यदि ऐसा है तो हमारे कितने ही मिथकीय कथानक-वांग्मय जिनमे चित्र-विचित्र दृश्य-परिदृश्यों, पात्रों, स्वर्ग-नरक के अजब गजब कारनामों की भरमार सी है, सभी विज्ञान कथा की श्रेणी में आ जायेंगी। मगर यहाँ एक बंदिश है- क्या कथित मिथकीय घटनाओं की तकनीक में किसी भी तरह की फेरबदल से उन्हें मौजूदा प्रौद्योगिकी के स्तर से जोड़ा जा सकता है? यदि किन्हीं मामलों में इसका उत्तर हाँ है तो निसन्देह वह विशिष्ट दृश्य-दृष्टान्त भले ही `साइंस िफ़क्शन´ के फ्रेम में फिट न हो सके वह विज्ञान फंतासी की देहरी को तो छू ही लेगा। लेकिन अधिकांश मिथकों का मौजूदा/समकालीन प्रौद्योगिकी से गर्भनाल का भी सम्बन्ध नहीं पाया जाता। अत: उन्हें विज्ञान कथा की कटेगरी में रखने में हिचक सी रहती है। हा¡ उनकी शैली, कथा प्रस्तुति कई बार आधुनिक विज्ञान कथाओं की सी प्रतीति कराती है। `द लार्ड आफ द रिंग्स´ एक ऐसी ही मिथकीय विज्ञान फंतासी है।
हाँ , यह अवश्य है कि विज्ञान कथाओं के कथावस्तु (थीम) के लिए मिथकों में माथा पच्ची की जा सकती है। उनमें कई ऐसी सूझें, युक्तियाँ -जुगते हो सकती हैं जिनसे विज्ञान कथाओं की थीम-आइडिया मिल सकती है। अन्तर्वंशीय (इन्टरजेनेरिक) शल्य प्रत्यारोपण (गणेश), आयोनिज जनन-क्लोनिंग (कौरवों की उत्पत्ति,रक्तबीज-महिषासुर) माया (वर्चुअल ) युद्ध (मेघनाथ का इस युद्ध विद्या में पारंगत होना) आदि अद्भुत संकल्पनायें हैं जिनकी आज की विज्ञान कथाओं में भी व्याप्ति है। मेरी एक कथा- `अलविदा प्रोफेसर´ एक दैत्य के भय के चलते प्रद्युम्न को शीघ्र ही युवा बना देने के अनुष्ठान की कथा से प्रेरित है। उर्सुला ली गुईन नामकी अमेरिकी विज्ञान कथाकार मिथकों को `समकालीन´ विज्ञान कथा का दर्जा देती हैं क्योंकि उनमें भविष्य की दुनिया -तकनीक की सम्भावनाओं की झलक होती है। कार्ल सागान जिन्हें कभी अमेरिका का ``शो मैन आफ़´´ साइंस कहा जाता था, भारतीय मिथकों के मुरीद थे।

Monday, February 11, 2008

सामाजिक कहानी ऑर विज्ञान कथा में फ़र्क !

एक आम सामाजिक कहानी और विज्ञान कथा में फर्क क्या है? फ़र्क स्पष्ट है- सामाजिक कहानी जहाँ हमारे समकालीन व्यष्टि- समष्टि का दु:खदर्द बयान करती हैं, विज्ञान कथायें अमूमन भविष्य की मानवीय समस्याओं को फोकस करती हैं- उनमें काल का विपर्यय बोध भी सुस्पष्ट दीखता हैं ,अमूमन उनमें हमारा जाना पहचाना समाज, जानी पहचानी तकनीके कुछ भी नहीं होतीं .हाँ उनका वर्तमान/समकालीन धरातल से एक `गर्भनाल का सम्बन्ध' अवश्य होना चाहिए। अर्थात आज की कठिनाइयों, विडम्बनाओं और यांत्रिक तामझाम-विज्ञान और तकनीकी से वे जुड़ी भी हों अन्यथा उनके कथ्य-कथानक का अन्चीन्हापन उन्हें मिथकों के स्वर्ग-नरक के समकक्ष तक ले जा पहुँचायेगा ।
यदि कथित विज्ञान कथाओं में वर्णित परिकल्पित तकनीक के स्तर में परिवर्तन से उन्हें समकालीन (कथा प्रणयन के समय के समाज) धरातल पर लाया जा सके तो समझिए वह सचमुच विज्ञान कथा है और यदि ऐसा सायास भी सम्भव नहीं हो पा रहा है तो वह विज्ञान कथा तो नही मिथक, जादू , प्रलाप या महज गप्पबाजी कुछ भी हो सकता है। कुछ विज्ञान फंतासियाँ इसी समूह में आती हैं। उनमें विज्ञान का कुछ छौंक बघार हुआ रहता है इसलिए वे भी विज्ञान कथा के लेबेल में आ जाती हैं।
`टाइम मशीन´ एक ऐसी ही जुगत है। जिसका वजूद में आना असम्भव सा है। मगर ए0जी0 वेल्स की इस सूझ से अतीत और भविष्य का सफर सहसा ही विज्ञान सम्मत हो गया- ऑर एक अनदेखी दुनिया के अनुमानित वर्णन की कथात्मक युक्ति कथाकारों के हाथ लग गयी। पहले लोग या तो स्वप्न को अतीत या भविष्य के अवगाहन का माध्यम बनाते थे या फिर ध्यान योग की ऋतम्भरा प्रज्ञा की शरण लेते थे। क्या `टाइम मशीन´ में बैठकर महाभारत काल में पहुंचकर श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद-गीता पाठ का श्रवण लाभ लिया जा सकता है? विज्ञान फंतासी में कदाचित यह सम्भव है।

Wednesday, February 6, 2008

आईये जानें क्या है विज्ञान कथा !

विज्ञान कथा दरअसल साहित्य की ही एक विधा है- किन्तु हिन्दी में सर्वथा उपेक्षित और अचर्चित।दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहे प्रौद्योगिकी बदलावों का मनुष्य के एकाकी अथवा सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है, इसका पूर्वानुमान/पूर्वाकलन ही विज्ञान कथा का विवेच्य है। सुप्रसिद्ध अमेरिकी विज्ञान कथाकार आइजक आजिमोव के शब्दों में विज्ञान कथा साहित्य की वह विधा है जो मानव समाज पर प्रौद्योगिकी जनित बदलावों की एक पूर्वानुमानित झलकी- तस्वीर प्रस्तुत करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह मानव की निजी और सामाजिक जिन्दगी पर प्रौद्योगिकी की बढ़ती दखलन्दाजी से उपजी मानवीय प्रतिक्रिया/अभिव्यक्ति की ही एक साहित्यिक प्रस्तुति है।
विज्ञान कथाओं में `काल विपर्यय (एनाक्रोनिज्म) मुख्य तत्व है- अर्थात किसी समकालीन पृष्ठभूमि- कैनवस पर कथानक के अंकुरण के बावजूद भी बहुत कुछ उस परिवेश से बेमोल/अनफिट सा घटित होता रहता है। उदाहरण के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम के हाथ में धनुष के बजाय ए0के0-47 दिखाया जाना या फिर गांधी जी का मोबाइल फोन पर बात करते हुए चित्रित होता, विज्ञान कथां की प्रकृति के सर्वथा अनुरुप है. विज्ञान कथाओं के सन्दर्भ में काल विपर्यय की यही अवधारणा है ऑर भविष्य का पूर्वानुमान तत्वत: विज्ञान कथाओं का मुख्य प्रतिपाद्य है। कैसी होगी आने वाली दुनिया, क्या जनसंख्या विस्फोट के चलते सागर की तलहटियों में बसेंगी मानव सभ्यताएं या फिर चाँद ऑर मंगल की ओर शुरू होगा महाभिनिष्क्रमण! क्या कम्प्यूटर क्रान्ति के चलते मनुष्य की लेखन कला कालातीत हो उठेगी और वह नये अर्थों में `मसि कागज छुओं नहीं 'को चरितार्थ कर केवल कम्प्यूटर की बोर्ड पर उंगलियों को थिरका सकेगा। लोग शायद भूल भी जायेंगे कि की लिखने के लिए कभी कागज और कलम का भी इस्तेमाल होता था। कागज कलम के पुजारी तब ढूढे भी नहीं मिलेंगे ।ऐसी दुनियाँ की यदि आज कथात्मक झलक दिखा दे तो समिझये वह विज्ञान कथाकार है।
विज्ञान कथा के दो मुख्य विभेद हैं- एक तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ज्ञात और मान्य तथ्यों पर आधारित होती है जिसे `सांइस फिंक्शन´ के नाम से सम्बोधित करते हैं ऑर जो विज्ञान के नाम पर केवल कल्पना के बेलगाम घोड़ों को `सरपट दौड़ाते रहने को तवज्जो देती हैं- विज्ञान फंतासी कहलाती हैं। हिन्दी साहित्य में `विज्ञान कथा´ इन दोनो ही प्रवृत्तियों का बोध कराने वाला सम्बोधन है। विज्ञान कथा को हम विज्ञान गल्प का सम्बोधन भी देते हैं क्योंकि बंगला साहित्य में `शार्ट स्टोरी´ को `गल्प´ कहा जाता है और यह शब्द हिन्दी में भी उसी अर्थ में प्रयुक्त होता है। `विज्ञान कथा´ को `वैज्ञानिक कहानी´ कहने में भी कोई गुरेज नहीं है। तथापि यदि कोई राम भक्त `टाइम मशीन´ में बैठकर राम रावण युद्ध काल में पहुँच कर अपने आराध्य को ए0के0 - 47 पकडा बैठे तो इस अनोखे दृष्ठांत को विज्ञान फंतासी कहना ज्यादा उचित होगा। किंतु चाँद की सरजमी पर खनिज सम्पदाओं के उत्खनन की तकनीक का विवरण देती कथा `साइंस फिक्शन´ कही जायेगी।
पुनश्च ............